पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५२८

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पार्कण्डिक-मार्कण्डेय फार कार्य सम्पन है। दो सौ वर्ष पहले एक यत्राघातसे "चिरजोवो यथा त्वं भी भविष्यामि तथा मुने। मन्दिरका. शिखर टूट गया है। . . ... रूपवान वित्तयां चैय भिया युकच सर्वदा ॥ . ... " शिवलिङ्गका ऊपरो भाग पीतलसे मढ़ा हुआ है ।या | मार्कपडेय महाभाग सप्तकल्पान्तजीवन। .... यो कहिये, कि शिवलिङ्गको मुफुट पहनाया गया है। ' - भायुरिष्टार्थसिध्यर्थ मस्माकं वरदो भव ॥" ..(तिथितत्त्व). मुकुटके चारों ओर पांच 'नरमुण्ड और ऊपरमें फण . मार्कण्डेयपुराणमें मार्कण्डेयका उत्पत्ति विवरण इस उठाये नागका चन्द्राताप है। . . . प्रकार लिखा है,-महात्मा भृगुके ख्यातिके गर्भसे धाता . याकी मन्दिरको निर्माण-प्रणाली खजूराहुके मन्दिर और विधाता नामक.दो पुत्र हुए। ये दोनों ही देवता आदिको तरह है। दो फीट तीन इञ्च लम्बो खोदित थे। नारायणको.पत्नी श्री भी इसी • सपातिके गर्भसे . मनुष्य मूर्ति चारों ओर श्रेणीबद्ध खड़ी है। प्रत्येक उत्पन्न हुई थीं। मेरुके दो कन्या थी', आमटि और श्रेणीमें ४५ मूर्तियोंके हिसायसे तीन श्रेणियों में १३५ ! नियति 1 , पाता और विः ताने दोनोंका, पाणिग्रहण मनुष्यमूर्ति है। मनुष्य श्रेणीके वाद हंस श्रेणी, फिर किया था । यथासमय भायतिके प्राण और नियतिके चन्दर श्रेणो. इसके बाद चार श्रेणीमें मनुष्य-मूर्ति खड़ी मृकण्ड नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। मृकण्डकी स्त्रीका है।' धास्तपमें मन्दिरका सम्मुख भाग नाना प्रकारके नाम,मनस्विनो.था। इन्हों' मनस्विन के गर्भसे मार्कण्डेयने भास्फरशिपसे सजा हुआ है। किसो किसी स्थानमें जन्म लिया। इनको स्त्रोका नाम धूमावती और पुत्रका गर्गकियोंकी मूर्तियां खोदी गई हैं। फिरकहीं वीणावादन | वेदशिरा था । : (मार्कण्डेयपु -५२ स० ) परायण अलङ्कार भूषिता सोमन्तनियोंकी मूर्तियां ) | नरसिंहपुराणमें लिखा है, कि भृगुके , एक पुत्र थे। शिल्पियोंके निर्माणनैपुण्यका साक्ष्य प्रदान कर रही है। मृकण्डु उनका नाम था। मृण्डुके मार्कण्डेय नामक , __शियमूर्तिका प्रशान्त भाव सर्वत्र ही परिस्फुट है। एक पुत्र हुआ। पुत्रके उत्पन्न होते ही मृफण्डको मालूम समरांगणमें रोटरसको अमिष्यक्तिमें घसन्त पुष्पाभरण हो गया, कि स पुत्रको बारहवें घमें मृत्यु होगी। इस विलोलनयना गौरोके साथ प्रेमालापके कमनीय भावमें | पर घे बड़े दुःखित हुए । एक दिन :मार्कण्डेयने अपने • सर्पत ही शियका प्रशान्त गाम्भीर्य रक्षित हुआ है। पितासे उनके दुःखका कारण पूछा। पिताने उनकी सिवा इसके नन्दिकेश्वर. 'मृत्युजय, यम, उमा महेश्वर, मृत्युका हाल जैसा सुना था, कह सुनाया। मार्कण्डेयने राजराजेश्वर. आदि मन्दिर भी विशेषरूपसे उल्लेख- | पितासे कहा, 'आप इसके लिये जरा भी चिन्ता न करें, नीय है। . . . . मैं अपने बाहुवलसे मृत्युको परास्त कर चिरजीवी हो माण्डिका ( सं स्त्रो०) भूम्याहुल्य, भूईखखसावल्ली। मकता है। पोछे मार्कण्डेय पिता और माताको आभ्वा. माण्डीय (सी०) भूम्याहुल्य, भूईग्यबसावल्ली। सन दे कर तपस्याफे लिपे जंगल चले गये। यहां विष्णु. माण्डेय (सं० पु०) मृकण्डोरपत्यं, मृकण्ड (शुभ्रादि- मूर्तिको प्रतिष्ठा करके कठोर तपस्या करने लगे। इस भ्यश्च पा ४११।१२३) इति ढक् । मृकण्डू मुनिके पुत्र । तपोवलसे ये मृत्युको परास्त कर चिरजीवी हो गये। जन्मतिथि और संस्करादि कार्य में इनकी पूजा करनो . : .... ... - (नरसिंहपु०) होती है। गर्भाधानादि संस्कारकाय में पष्टीपूजाके वाद पद्मपुराणमें लिखा है-महामुनि मृकपड. सनीक मार्कण्डेय पूजा की जाती है। इनका ध्यान इस प्रकार है- तपस्या कर रहे थे। इसी समय उनके मार्फएय ___द्विभुज जटिभ सौम्य सुवृद्ध चिरजीविनम् । : .. | नामक पुत्र उत्पन्न ! हुआ। पुनकी पाठवें वर्ष मृत्यु .: मार्कपडेय गरो भात्या पूजयये चिरायुपन् ।' - होगी, यह उन्हें अच्छी तरह मालूम था। इसलिये . . ।। (तिभितत्व) | पुतको यज्ञोपवीत दे कर मृकण्हुने कहा, 'तुम भूपियोंकी इस ध्यानसे विधिपूर्वक पूजा करके निम्नोक मन्त्र अभिवादन करो। मार्कण्डेय चैसा ही करने लग 'वारा प्रार्थना करनी होती है। प्रार्थनामन्त इस प्रकार है- ' गये। इसी समय सप्तर्षि यहां पहुंचे।मार्फएट पने उनकी . .. .... ..... .. ...... .. . . .......-- - ---