पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५३३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


' 'मार्जना-पारिगन्या ४७५ सामूचा गरोर पोंछ डाले । इसको गीण स्नान कहते हैं। हिन्दू शास्त्रशोका कहना है, कि नार्गनोरनः यानी "अशिरस्कं भवेत् स्नानं स्लानाराको नु कर्मिणाम्। । झाड़ को धूल शरीरमें नहीं लगानी चाहिये । इससे भाद्रण यासमा वापि मार्जनं दैदिक विदुः॥ इन्द्रतुन्य व्यक्ति भी शीघ्र ही धीम्रए हो जाते हैं। इति जावालवचनात् शिरो विहाय गात्रमन्नाननं तदशक्तौ । २ मध्यम स्वरको चार श्रुतियोमिंसे अन्तिम श्रुति । सर्वगात्रमार्जने भाद्रेग यासठा कुर्यात् ॥" । मा नोय (म० वि० ) माज ने इति मृज् अनीयर । १ ( आह्निकतत्त्व । स्नान देना । ' मानयोगा, परिष्कार करने योग्य । २ अग्नि । ३ वैदिकसंध्या फरनेके समय मन्त्र पढ़ कर मस्तक शोधन । और गालादि पर फुशपत्र द्वारा जल सिञ्चन करे । इसको मार्जार (सं. पु०) मृज किञ्जिमनिम्या चित् । उगा ३११३७) मो मार्जन कहते हैं। मान द्वारा विशुद्धिता लाम . इति भारचित् 'मृजे द्धिः' इत्यर्ज लदचोक्त द्विश्च । होती है, किन्तु इस वैदिका संध्याघासनान्तर्गत मार्जन १रकचित्रक वृन, लाल चीता पेड़ । २ पूनिसारिवा, द्वारा पापमल दूर और शरीर पवित होता है। इसीसे बनविलाय। ३ खट्टास, खाम । ४ बिदाल, दिल्ली। प्रति दिन सन्ध्योपासनाके समय पहले ही मार्जन करने- मार्जारको स्पर्श नहीं करना चाहिये, संयोगवश यदि - को कहा गया है (पु०) माातेऽनेनेति माल्युट। स्पर्श हो जाय, तो स्नान कर लेना उचित है। ३ लोध्ररक्ष, लोध। ४श्येत लोन, सफेद लोध। ५ "यभोज्यसूतिकापपडमाजीरावरफुलकुरान । रक्त लोध्र, लाल लोध। पनितापविद्धनपडारन मृतदाराश्च ध वित् । मार्जना (सं० स्त्री० ) माय ते इति माञ भावे युच. संस्पृश्य शुध्यते स्नानादुदक्यामामशुकरी ॥" या । १ मार्जन, सफाई ।२ मुरजध्वनि, मृदंगकी वोल। (मार्कण्डेयपुराण) ३ क्षमा, माफो। पारिमाधिक मारि-जो फेवल बाहङ्कारके लिए जाप मार्जनी (सं० स्त्री०) माातेऽनयेति मा फरणे ल्युट तप करता है तथा जिसका कार्य पारमार्थिक नहीं है स्त्रिया हो । सम्मानो, माड़। उसको मार कहते हैं। ऐसे व्यक्तिको विद्याल तपस्वी "नमामि शीतला देवीं रामभस्थो दिगम्बरीम् । कहते हैं। इसका यन्न अभोज्य है। अर्थात् विड़ाल- माननी कलसोपेता शूनिट्कृत मस्तकाम् ॥" तपस्वीका अन्न सानेसे पाप होता है। ( जीतनास्तय) "दम्म जपते यथ तम्यने यजते तथा । । न परमार्थ मुद्युक्तो मारिः परिकीर्तितः ॥

  • "शिरसो मार्जनं कुर्यात् कुशैः सोदकविन्दुभिः ।

अभोज्याः सूतिकापपडमारियश्च पुरयुटाः ॥" प्रणवो मभुवः स्वरच गायत्री च तृतीयिका ॥ (वामनपु० १५ २०) भयदेवत्यं त्र्यचय चतुर्यमिति माजनम् ॥ मार्जारक (सं० पु०) मार्जार (संज्ञायो फन् । पा ४१३१४७०) • उकारो भुरादिव्याइविषय तृतीया च गायत्री चतुर्थ आपोहि ! इति फन् । २ मयूर, मोर । २ बिडाल. विल्लो । ष्ठति का इतो मार्जिन मार्जनक्रियाकरणमित्यर्थः। मारिफएठ (सं० पु०) मारिस्येय फाण्टः कण्ठस्वरो - भूगन्ते मार्जनं कुर्यात् पादान्ते या समाहितः ।। यस्य यद्वा मार्जारो मरणः कण्ठो यस्य । मयूरमोर । आगो हि ष्ठेचा कार्य मानन्तु कुशोदकैः ॥ मार्जारकर्णिका (स. स्त्री०) मार्जारम्य कर्णो इय की 'प्रतिभपवसंयुक्त क्षिपेन्मुद्धिन पदे पदे । यस्याः, स्त्रियां-डीप स्वार्थे फन् । चामुण्डाका एक नाम । अचस्यान्तेऽथवा कर्यादपीणा मतमोशम् ॥ मारिकणों (स'. स्त्री०) मार्जारस्येय वर्णावस्याः भागे हि टेति मुक्तस्य सिन्धुद्वीपमृषिः स्मृतः । डोप। चामुण्डाका एक नाम । पापा के देवता छन्दो गायत्री मार्जने स्मृतम् ॥" मार्जारगन्या (मस्ती ) माारस्येय गन्धीऽस्याः। ( भानिकतत्त्य) । मुद्गपणों, वनमूग।