पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५४

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मस्तिष्क - (४) स्नायुके बल देनेवाली औषधियां,-आर्सेपृद्धि और कमी होती रहती है। सभी कभी, यह . निक, फसफरस, हाइपोफस्फाइटस. पचीनाइन, नफ्स- पीड़ा एक ही जगल या कभी दोनों बगल होती है। भमिका, नोकनिया, सलफेट, मेलिरियनेट साफ कपर, एक ही वगल होनेवाली पीडाको अधकपारी. और दोनों ... क्लोराइड आफ वेरियम और गोल। यगल होनेवाली योडाको शिरपोदा कहते हैं। गिरकी . . (५) मेन्थल, थाइमल, कोराल हाास, कैफर । पोसा कभी कभी एक स्थानिक भी होती है, जिसमें शिर. मिपसचर, कोकेन, इत्थर स्य, कोरोफारम् , अफीम, के एक ही जगहमें दर्द होता है। . . . येलेरोनिया और एकोनाइटका लिनिमेएट, पोडास्थान- शिरका घूमना या 'मेनियसडिमिज-स्पर्श, दर्शन, फा क्षणिक अयसादक और चिकना करनेवाला तथा श्रवण और सेरिबेलमकी क्रिया सुन्दानासे न होनेसे दो उत्तापसंम्पर्श, घर्षण, मन और जलधारा आदि स्थान यह रोग उत्पन्न हुआ है, ऐसा समझना चाहिये। उत्तेजक कहे जाते हैं। मस्तिष्ककी पीठा-मावकता सेवन, मानसिक परिश्रम, (६) पमोनिया, फार्बनेट आफ हाहास पमो.) मलेरिया ज्य, मूत्रनालीको पोड़ा और मस्तिष्क क्षोण । निया, प्रमाउस, स्मीट, इत्थर, कोरोफारम्, हाइडे सिया- होनेसे यह पीड़ा उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है। निफ पसिद पिपरमेण्ट, लेवेण्डर, केजुपटी और र आदि मस्तिस्कको सभी पीड़ामों में गर्भ भीर उदर पोटा.. तेल, मेन्थल, कप हिङ्ग, पमोनायषस, गैलयेनम्, भालि | जनित प्रत्यावर्त्तनिक व्याधियों में येलेप्पोला द्वारा शरीर ... रिपेम्, कस्तूरी, अफीम, मफिया, चरस, वेलेडोना, एद्रो. विषाक्त रहनेसे और यूरिमिया, टायपिटिस जएिशम् पिया, फेलेपारविन, लोविलिया, टामोनियम आदि ) और डिलिरियम् द्विमन्स भादि रोग, मस्तिष्क के . आक्षेप-निवारफ है। विकारफे कारण प्रलाप (मनट सनटका योलमा परुषक ____ मस्तिष्क रताधिक्य, जलन, आघात अथवा उसमें फरना) मा उपस्थित होता है। यह मलाप कमी तेल पतला और दूषित रकका सञ्चालन, स्नायुशूल रोग, (Furious ) कभी धीमता (low muttering) होता पाकस्थली, अतहो, ययात (तिली) या जरायुको है। इससे रोगी कभी जोरोंमे कभी मस्पष्टतापूर्वक विविध पोड़ा, मलेरिया जनित अथवा अन्यान्य ज्पर असहस यात-पता रहता है। साथ ही छाँठ भोर बुखारों मीर अनिद्रा, शिथिल स्यभाय, मनस्ताप, मान. जीभकी फटकान भी देखो जाती है। सामान्य प्रगसे सिक और शारीरिक अत्यधिक परिश्रम, थकापट या फमशः दोल-चालका बन्द हो जाना या स्परता भा फाको अफीमफे व्यवहार और निरन्तर मदिरा पौने | जाती है। रोगीके योच बीच में मानकी यात कहने पर ।। भारिफ फारण मस्तिष्कमें पीड़ा मालूम होने लगती है। भी शय्यासे उठ जानेवालो इच्छा पतः प्रपल रहती है। इसे शिरःपीडा या शिरका यई (Headache या Cepha-i संन्यास, युरेमिया मोर पदमूल रोग मस्तिकमे लाको lalgia) कहते हैं। यधिकता मार रक्तको कमी होनेसे मदिरा, भकीम, बेले.' ___ रताको अधिकता या फमीसे होनेवाली मस्तिष्कको | शोना, पूसिक पसिर, कोरोफारम् या कार्यानिक मासा. शिसी तरहको पीडा अयया अजीर्ण या पित्ताधिषपो ए द्वारा गरीर यियाक्त होने पर और मामपन्तरिक कारण होनेवाला शिरदर्दफे कारणफे अनुसार इन रोगों फिसी पन्तके हट-फर जानेसे या मा, मनस्ताप को यथामाम काटिय, पनिमिक नायंस, टिप्पटिक! आतपात या यनाघात लगनेसे क्षोण मस्तिष्क रोगीको और विलियम हेटेक कहते हैं।. . . . . । यार यस्तुका शान, स्पर्श, यापपोशारण और गमना. मस्तिकको पोला क्षणिक, दोकालस्थायी, फट गमन शक्तिका लोप हो जाता है। इसको stupor या कन, कनकनाना, बाल (ऐदनेको सरह दर्द ) उचाप मौर/ Cuma कहते है। मारीपन गादि भापयिनित होती रहती है। फासी, लिपिसमायसम्म पनियों मादामा दो .. प्रकाश शर मौर गाविशेषके व्ययहार कार इसका व्यवहार करनेके दार गीतलता, मीर उमाप, मति