पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५४०

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पाल--मालक गनी हो राजमो रिमागको उत्पत्ति हुई होगी। कोदरा बालिकाओं की लाश पट कर अमोनमें गाड़ी जाती माल वानर पकड़ता है। मालूम होता है, कि खैरासे है। जो गरोब है उसकी लागको उत्तर शिर करके नदीके गोटा ढोम जातिकी नानाविशेषको उत्पत्ति हुई है। किनारे गाड देते हैं। मानागान्या-नातियों के कपड़ा युननेफे मानेसे उत्पन्न कृषिकार्य ही इनकी प्रधान उपजीविका है। बहुतेरे दुआ है। मजदूरी करके भी अपना गुजारा चलाते हैं। ये लोग ये लोग सगोवमें विवाद नदों करते। पितृपक्षमें सूअर और गो-मांस आदि नहीं पाते, इस यातका इन्हें पांर पोढ़ी और मातृपक्ष में तीन पीढ़ो छोड़ कर वियाह | यहा गौरय है। करते हैं। अब कोई इस जाति में मिलना चाहता है, नय | माल-सिंहभूम जिलेको एक प्रकारको भुइयां जाति । यह माल सरदारका पादोदक लेता भोर समाजको एक किसी किसी कैयत की भी माल उपाधि है। बड़ा भोजन देता है। माल (संस्थान मल्ल ) कुमी जातिको एक पाया। आजम- वाल्य और पीयन दोनों प्रकारका विवाह इनमें गढ जिलेमें ये अधिक संख्यामें रहते हैं। प्रवाद है, कि प्रचलित है। यहुयियाह प्रचलित पदने पर भी ये दीनता | मयूरभट्ट मुनिके औरस और किसी फुमी रमणोफे गर्भसे के कारण एफसे अधिक स्त्री नहीं करते। विधवा-विया इनकी उत्पत्ति है। मयूरभह गोरखपुरका परित्याग कर प्रचलित है । इसके लिये कोई विशेष अनुष्ठान नहीं करना सरयूनदी किनारे करादि नामक स्थानमें रहते थे। होना । फेवल तुलसीको माला बदल देनेसे ही विधवा- यह स्थान आजमगढ़ जिलेय नाधुपुर परगनेके अन्तर्गत विवाद सम्पन्न होता है। स्त्री यदि व्यभिचारिणी है। यर्तमान मालोंका कहना है कि उन्होंने फन्नोज । निकले तो म्यामी प्राम्य पंचायतकी अनुमति ले पर उसे गज हर्षयनसे निष्कर भूमि पाई है। ये लोग गोरखा छोट सकता है। व्यभिचारिणी भी विधवाको तरह फिर पुरफे नागवंश कुर्मियों के साथ भादान-प्रदान करते है। मे बियाह कर सकती है। कोई भी एकसे ज्यादा विवाह नहीं करता। इनमें इस ज्ञातिफे लोगोंने अभी सम्पूर्ण रूपसे हिन्दधर्मको वाल वियाह प्रचलित नहीं है, विधयायिया निविद्र है। अपलभ्यन कर लिया है। उनमें मादिम-धर्मका अभो । इन लोगोंके मध्य वैष्णयोंको संख्या यष्टुत गोड़ी है, फोई मी चिट दिखाई नहीं देता। ये लोग जनसाधारणमें प्रायः सभी ध्याय हैं। ये लोग कालीपूजा तथा प्रचलित स्थानीय धर्मको प्रहण करते हैं। फिर कहीं | विविध प्राम्यदेवताको पूजा करते हैं। इनका आचार कहीं पे लोग अपनेको वैष्णय शैय और शाक्तः यतलाते । व्यवहार यदुत कुछ कुर्मियोंसे मिलना जुलता है। ६ जननी मनसा इनकी कुलदेयो हैं और बड़ी धूमधाम-माल-नेपालके अन्तर्गत एक पर्गतका नाम । मे उसकी पूजा करते हैं। किसी किसी जगह ये ग्राह्मण मालफंगनो ( हि० स्त्री० ) एक लनाफा नाम। यह हिगा. पुरोहितको नियुक्त करते हैं और कहीं नहीं भो करते। लय-पर्वात पर मेलम नदीसे आसाम तक ४००० फुटको किन्तु गासर यूढ़े हो पूजा करते हैं। मन्याल परगने ऊनाई तक तथा उत्तरीय भारत, वरमा और सदाम पाई में राजमालामोंफे पुरोहित ग्रामण है। जाती है। साधारणतः पे मृतदेवको मदीके किनारे गलाते है। इमको पत्तियां गोट और फुछ पुछ नुकीली होती और चिता भस्म ले कर जलमें फेक देते हैं। पारये दिन है। यह लता पेड़ों पर फैलती है और उन्हें भाग्यादित प्राथमिसा दिलुमोशी सरह होती है। जिसकी मप कर लेती है। चैनौ महीने में हममें पीदमे घोर फल . धातसे मृत्यु होती है उसका नौ दिनमें धाद्ध होता! लगते । मागे लता फलामें मदी हुई शिलाई पड़ती दि। कालोपूनाको गनको ये मृत् पूर्वपुरुषों के सम्मानार्य है। जप एल भर जाने दें. सब इसमें नी नीले, पान . मदासमारोह मशाल मादि जलाते हैं। चैत्र मासके.! लगने हैं। ये फल पाने पर पीले रंगपं. भीर मटर मन्तिम दिनमें ममी पिलूतपंण करते हैं। बराबर होते हैं। पलाये भांवर लाल दाने मिदन'