पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५४१

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मालतोनारक-मालदह ४८३ पुष्पोद्यानमे यह फूल उत्पन्न होता है। हिमालय-सन्नि- १८७६ ईमें यह जिला मंगटित हुआ है। यह अशा २४ हित कुमायूप्रदेश में इसके मूलसे पीला रंग तैयार किया २६५० से २५ ३२३० ३० तशा देशा० ८७°४८ से जाता है। ८८ ३३३० पूरवके मध्य अपमिगत है । दमय दक्षिण अन्यान्य सुगन्धित फूलोकी तरह इसका पुष्प तेलमें पश्चिमकी और गंगा नदी बहती हैं। भूपरिमाण प्रायः व्यवहार होता है। इसकी जड़के रससे दद् आदि चर्मः १८६१ वर्ग मील है। इसका प्रधान शहर अगरेज- रोग सहजमें दूर होते हैं। भगन्दर आदि क्षनरोगों में इसके बाजार महानन्दा नदीके दक्षिण तोर पर वमा हुआ है। छिलकेका रस बहुत फायदेमंद है। महानन्दा नदी इस जिले में उत्तरसे दक्षिणकी ओर २ युयतो 1 ३ यारह अक्षगेंकी एक वणिक वृत्तिका बहती हुई समूचे प्रदेशको दो भागोंमें विभक्त नाम। इसके प्रत्येक चरणमें दो नगण, दो जगण और करती है। इसका पश्चिम भाग पंक और मिट्टीसे अन्तमें रगण होता है । ४ छः अक्षरों की एक वर्णवृत्तिका भरी हुई नीची जमीन है और अत्यन्त उपजाऊ है । इस. नाम। इसके प्रत्येक चरणमें दो जगण होता है। ५ का पूर्व भाग प्राचीन गौड़ नगरके खंडहरोंको चारों ओर- सधैयाफे मत्तगायद नामक भेदका दूसरा नाम । ६ रात्रि, से घेरे हुए हैं। जहां पर यह नगर था वहां अप घने रात । ७ ज्योत्स्ना, चांदनी । ८ पाठा, पाढ़ा। जाय. जंगल भरे पड़े हैं। पूर्वी हिस्सा कुछ ऊँचा है और फलका पेड़, जाती। वरेन्द्र कहलाता है। यह भाग महानन्दाके पूरवी किनारे मालतीक्षारक (स० पु०) टङ्कण, सोहागा। है। इसके योच टाङ्गन और पुर्नभया नदी अनेक माया मालतीज्ञान (स पुल ) मालत्यां मालतीनदीतोरे जातः। प्रशाणामों में विभक्त हो पहनी है। यहांको जमीन कड़ी रहणक्षार, सोहागा। ' तथा लाल रंगको है। यह स्थान कटहल नामक स्थानीय मालतोटोडी (हिं० रखी०) सम्पूर्ण जातिकी एक रागिनी। फटोले यूक्षीसे भरा है। यहां वामन धान रब होता है। इसमें सब शुद्ध स्वर लगते हैं। जाड़े के दिनों में भिन्न भिन्न स्थानसे मजदूर लोग यहां मालतीतीरज (स' पु०) मालती तदाख्या नदी, तस्या- } धान काटने आते हैं। स्तोरे जायते इति जन-ड। टङ्कण, सोहागा। महानन्दाके किनारेका भूभाग अनेक प्रकारके शस्यी. मालतीतीरसम्मय ( स० को०) मालत्यास्तोरे सम्भयो से सुशोभित है। दोनों किनारों पर बड़े बड़े आमके ऽस्य । श्वेत टङ्कण, सफेद सोहागा। बगीचे तथा इमली वृक्षोंके फतार दीख पड़ते है । उत्तर- मालतीपत्रिका ( को०) मालत्याः पत्रीय, मालतो- पश्चिमसे दक्षिण तफ गंगा सीमाबंदी करती है। पत्र-प्रतिशती कन्, टाप् अत इत्य। जातोपत्री, गंगाको धारा राजमहल पहाड़की मिट्टीको मालदह जावित्री। बहा ले पाती है और इसकी जमीन पर पंक जमा देती मालतीपुष्प ( स० क्लो०) मालत्याः पुष्प मालतीपुष्प ।। है। गंगाको पुरानो धारा प्राचीन गौड़के पास यहती मालतीफल (सी०) मालत्या फल। जातीफल, थी। नदोके पुराने गर्भको देखनेसे साफ मालूम होता जायफल। है, कि गौड़ अत्यन्त सुरक्षित शहर था। महानन्दाको मालतीमाला (संस्त्री०) मालतीनां मालती-पुष्पानां प्रधान शाखा कालिन्दी वाणिज्य प्रधान हियातपुर नामक माला ६-तत् । मालतीपुष्पकी माला। स्थानके पास गंगासे मिली है। घर्पाकालमें रांगना मालद ( स० पु.) वाल्मीकीय रामायणफे अनुसार एक और पुनर्भवानदी हो कर दिनाजपुर आदि स्थानोंसे प्रदेशका नाम । इसे ताड़काने उड़ दिया था।२ नाग अशरफे याणिज्य द्रयोंसे लदी हुई ना मालदह मार्कण्डेयपुराणके अन्तर्गत एक अनार्य जातिका नाम। में भा टहरती हैं। मालदह-बंगाल गवर्नरके शासनाधीन एफ जिला गौड़ नथा पौड्याग इन दो प्राचीन राजधानों के राजसादी भोर गागलपुरके युछ अशोको ले कर सन् : यंहहरों पर दो मालदह वसा हुआ है। गंगा किनारे