पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५५७

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मालपहाड़िया-पालना की बलि देते है। यह मांसका प्रसाद घरवालोंको छोड़। हैं और श्राद्धादि-क्रिया कुछ भी नहीं करते। लेकिन दूसरे नहीं खा सस्ते। कुमारभाग प्रान्त के मालपहाड़ियोंने अपने दिन्दू पड़ोसी. सूर्य के वाद हो ये लोग धरती माईको पूजा करते है। की देखादेवी श्राद्धादि करना शुरू कर दिया है। धरतीको दासी 'गरामा' देवीको भी पूजा होती है।। ये लोग 'झुम'-को खेती और शिकारको अपना पैतृक उसके वाद सिंहवाहिनीको पूजा होती है। सिंहवाहिनी पवसाय समझते हैं। फसल जब अच्छी तरह नहीं बाघ, साप, विच्छ आदि पर शासन करती हैं। पृथियो । लगती, तब ये नाना प्रकारके जगलो फल-मूलको खा माताको पूजामें आपाढ़ और मायके महीनेमे बकरे, सुगर कर जान बचाते हैं। बाज फल ये लोग फल-मूलको और पक्षीकी बलि दी जाती है। खेती करने भी लग गये हैं। ये लोग सूअर और मुगी. हिन्दुओं को दूर्गा-पूजाके समय ये लोग परे, भै'से का मांस खाते हैं, किन्तु गो-मांस, सांप और छदर- बलिदान दे कर सिंहवाहिनीकी पूजा करते हैं। का मांस हत तक भी नहीं। ये लोग नाचके बड़े प्रेमी होते हैं । एक अनोखी प्रथा मालपुआ (हिं० स्त्री० ) मालपूमा देखा। इन लोगों में देखी जाती है । जिसके कल्याण के लिये नाच मालपुर-वम्बईप्रदेशके मध्य एक करद राज्य राजधानी- गान होता है उसे उत्सवकी पहली रातको पुआल पर | का नाम मालपुर है। यह अक्षा० २३० २१ २० उ० सोना पड़ता है। पीछे नशेको हालतमै नर्तक और नर्स तथा देशा० ७३२४३०"० महीकाथा राज्यके दक्षिण- कियां उच्च स्वरसे शब्द करती हुई उस सोते व्यक्ति के पूर्व में अवस्थित है। यह प्रदेश पर्वत और जंगलोंसे घिरा चारों ओर नाच गान करती हैं। । है। बाजड़ा और गेहूं यहाँको प्रधान उपज है। इसके ऊपर कह गये देवताओं के अलावा ये अनेक दानवों- सिवा यहां और भी कई तरह के गन्न उपजते हैं। वर्तमान को भी पूजा करते हैं। उनमेसे चोर-दानव और महा- | राजाओंकी उत्पत्ति इदर-राजवंगसे है । किरानसिंहजी दानय ही प्रधान हैं। अडे चढ़ा कर महादानवकी पूजा के कनिष्ट पुत्र विराजमल इदररायसे यी पोढ़ीमें हैं। होती है। हिन्दू देव-देवीके मध्य ये लोग काली और उन्होंने राज्यको खूब पढ़ाया था। उनके लड़के खानजि- लक्ष्मीको पूजा देते हैं। माल नामक स्थानमें प्रतिष्ठित हुए । उनके पौत्र रणधीर- माली जातिको तरह मृत पूर्व-पुरुवाओं की पूजा भी, सिंहजी मानसे मराना नामक स्थानमें जा कर घस गये। इन लोगों में चलती है। ये लोग सयुएके पेड़में सिन्दूर। उसके बाद उनके प्रपौत्र रावल यागसिंहजी मालपुर, लेप उसकी पूजा करते हैं। यही कारण है कि ये अधिष्ठित हुए। उस समय मालपुर मालोकान्त नामक सखुपके पेड़को नहीं काटते । मांझी या घरका मालिक | एक भील सरदारको अधीन था। मालपुरवासी एक ही पुरोहितका काम करता है। सभी ब्राह्मणके बडे। ब्राह्मण परमासुन्दरी कन्या धो। मालोकान्तके साथ भक्त होते हैं। . उसका खूब प्रेम था। यह देख ग्राह्मणने गुस्सा कर ये लोग मु जलाते हैं। जलाने याद अस्थियोंको रावलसिंहको शरण ली। रापलने युद्ध में मालोकान्त. नदीके गहरे जलमें फेक देते हैं। को पराजित किया और मार भगाया। उसी समयसे ____ शौच पंच दिन रहता है। इस समय कोई नमक | रायलके घंशधर यहां राजत्व करते हैं। रावल दोप- नहीं खा सकता। ६ दिन हजामत आदिके बाद जेठा सिंहजी १८८१ ३०में विद्यमान थे। ये राठोरवंशीय लड़का अपने समाजको भोज देता है। अन्त्येष्टि क्रियाफे राजपूत तथा किरातसिद्धसे ३३ पीढ़ी नीचे थे। ये टिश लिपे राजाको यथोचित कर देना होता है। यह सब सर्ग सरकार, इदरके राय और बरघा गायकवाहको कर देनेके बाद भी भगर मृतकका धन कुछ बच रहे तो यह देते हैं। उसके लडकी में वट जाता है। लड़कियों को कुछ नहीं मालपूमा (हि० पु०) एक एकयानका नाम । इसका मिलता । गोद लाग धनामायके कारण मुर्दे गाड़ देते बनाने का तरीका इस तरह है। गेहके आटे या सूजीको