पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५६१

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मालेवा . ४६५ मालूम होता है, कि ये जिस समय मगधके राज-1 का आश्रय लिया । इन सब योगेको महायतासे सिंहासन पर सम्राटके रूपमें विराजमान थे, उस समय गोंके राजा रुद्रदाम कजातिको घोई हुई प्रतिष्ठाको भी इनके एक लड़के इनके अधीन मालयाका शासन लौटानेमें समर्थ हुए थे। दाक्षिणात्यके स्वामी गातकर्णि , करते थे। शिलालेखसे जाना जाता है, कि सम्राट अशोक इनके सम्बन्धी थे, इसोसे इन्होंने उनके पैतृक राजा ने अपने साले ययग तुपापको सुराष्ट्र प्रदेशका शासन में हाथ नहीं बढ़ाया । राजा रुद्रदामके समय मालया- भार दिया था । मौर्यवंशकी शक्ति क्षीण होने पर में गोंकी उन्नति चरमसीमा तक पहुंच गई थी । रुद्र मुसलमानोंने सुराष्ट्रसे मालवामें अधिकार बढ़ाया था। दामवंगके राजीने ई०स..को चौथो शताब्दी तक राज्य पश्चात् मालया पर शक लोगोंका आधिपत्य हुआ। ये किया था। ये लोग क्षत्रप महाराज' कहलाते थे। इस .लोग ब्राह्मणभक्त तथा क्षत्रिय थे। जैन लोगोंकी कालका- कवंग २८ राजामों के नाम तथा राज्यकाल मिलने चार्गकथासे ज्ञात होता है, कि मालवाकी राजधानो! हैं। भारतवर्ष देखो। उज्जैन पर ७४ वर्ष इस्वोसन्के पूर्व से ५७ वर्ष तक शक आर्यावर्त्तम गुप्त, दाक्षिणात्यमें चेदि और चालुपय लोगोंका अधिकार रहा । उस समय सातयादनवंश राजवंशके अभ्युदय होने पर मालयाके शवपर्यशका भी दाक्षिणात्यमें बढ़ा चढ़ा था। सम्भवतः सातवाहन-। लोप हो गया। मालगामें देशी शासनको स्थापनाके वंशके विक्रमादित्य नामक राजाने शक लोगोंको हरा। साथ फिरसे माला या विक्रमीसम्मत् प्रचलित हुमा । 'कर मालवामें सम्वत्का प्रचार किया जो मालवीय या इतिहासवेत्ता फर्गुसन साहबने गहरो आलोचना कर विक्रम सम्बत् नामसे प्रचलित हुआ। इसीविक्रमादित्यने । दिखाया है, कि सन् ५४४ ई०में विक्रमी सम्बत् चलाया शक लोगोंको परास्त कर "शकारी" उपाधि प्राप्त की। गया था । लेकिन मालयाके मन्दशौरसे प्राप्त कुमार- विक्रमादित्य देखो। इनका या इनके चंशके राजाओका गुमके शिलालेखमें ४६३ मालय संवत् अर्थात् सन् ४३६ मालया पर अधिकार स्थायो नहीं रहा । ईस्वीसन् ईसन पाया जाना है. पहले ही फाहा जा चुका है, कि को श्लो शताब्दीमें शक लोगोंका अधिकार फिर फैला चौथी शताब्दीम शकोंके राज्यका अन्त हो गया। था। पहले चटनके पिता यहां एक साधारण | जब तक मालयामें शकोंका शासन रहा तब तक भक राजा थे। लेकिन शोंके राजा महावीर चश्न आन्ध्र- सम्बत् चलता रहा । ५वीं शताब्दीमें मालवजातिके घंशको हरा कर सम्पूर्ण मालयाके राजा हुए। इन्होंने | भाग्योदयके साथ ५यों शताव्होसे फिर मालय अर्थात् विक्रम सम्बत्के स्थानमें अपनी जातिका गौरव दढ़ाने विक्रमी सम्वत् चलने लगा | गुप्तसम्राटी के शासन के लिये शकान चलाया। शकान्द और सम्बत् देखो। फालमें यहां गुप्त और मालय दोनों ही सम्यत् इनके प्रभावसे सातवाहनवंश शक्तिहीन हो गया || चलते थे। इसका स्पष्ट प्रमाण कुमारगुपके शिला. लेकिन इनके स्वर्गवासी होने पर इनके अधीन राजा लेखसे मिलता है । ई०सनको ५यों शताब्दीमे गुप्त- नहपान और इनके जामाता उपयदातने महाक्षत्रपकी सम्राटोंके अधीन थर्मन राजाओंका यहां अभ्युदय हुमा। उपाधि धारण की और राज्यका विस्तार किया। इन ! शिलालेयाम नरया , उनफे पुत विभ्ययम्मा ( सन् ४२३ लोगोफे प्रभावसे उज्जैनफे राजा चटनफे पुत्र जयदाम ) १०) और उनके पुत्र यन्धुयर्मा ( सन् ४३६ ६० ) इन और उनके कुटुम्ब सातवाहन लोग श्रोहीन हो गये। सन् | तीन यर्मन राजाभों के नाम मिलते है ।दापुर (बत्त. १३३ ३०में सातवाहनों के कुलभूषण गीतमोके पुत्र राजा मान मन्दशोर )में इनको राजधानी घो। इन तीन शातकर्णिने शक लोगोंके घमण्डको चूर कर दक्षिण पथ | राजाओं के बाद जिन्होंने मालयाका शासन किया उनके से राजपूताना तक अपना अधिकार फैला लिया। नाम नहीं मिलतं। नन् ४८४ १०में सुरश्मिचन्द्र . लेकिन उनका मो शासन स्थायी नहीं हो सका। परा राजाका नाम शिलालेपमें पाया जाता है। ये सन्नाट जित शक-वीरोंने उज्जैन मा कर जयदामके पुत्र रुद्रदाम. युधगुप्तके अधीन यमुनासे नर्मदा तहके मापूर्ण ।