पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५६२

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पालवा निकला है। सरकारने इस स्थानमें लोहा गलानेका। यहांके वासिन्दे अपने जीवन में कमसे कम एक बार कारखाना खोला था, दुर्भाग्यवश वह फारखाना अभी नर्मदाके किनारे ओङ्कारविप्रइ और गलाके किनारे उठा दिया गया। शरणघाटका, दर्शन करते हैं तथा पवित्र नदीके जलमें अधिवासी। मरे हुए की अस्थि फेंक देते हैं । तो दर्शनफे बाद सिन्दे. राजपूत, भील, कुतुरी, अंजना और अहीर लौटने पर प्रत्येक मनुष्यको वडे समारोहके साथ अपने ; नामफे छानसे खेतीहर यहां रहते हैं। मगिया जातिके | Hit स्वजनों को एक बड़ा भोज देना पड़ता है। भोजनको.

लोग मेहमे मा कर यहां यस गये हैं। ये लोग चोरी दक्षिणा में हर एक निमन्त्रित व्यक्तिको पोतलको एक एक फरनेमें पड़े कुशल होते हैं। महीर और मजना जाति- थाली दी जाती है जिनमें देनेयालेको नाम खुदा रहता . . के लोग धनवान हैं। साधारणतः जुआरका मैदा यहां- है। यहांके कृपक बड़े गरीद हैं। ये लोग धनिया के कृषकों का प्रधान पाद्य है। ये लोग अकोमके भुने लोगोसे २५ २० सैकड़े सूद पर स० कर्ज लेते हैं। हुए पत्तोंके माध रोटी खाते हैं। मन नहीं मिलने पर जेवर बन्धक रखनेसे १२, १४ रु० सैकड़ा, शरीर बन्धक ये लोग फरिन्दा नामक जामुन म्या फर प्राण-रक्षा करते रखने या नौकर हो कर रहनेसे । २० सैकड़ा सूत्र देना हैं। इनकी साधारण पोशाक धोती, कमरयंद, कुरता पड़ता है। और चादर है। धनी लोग आस्तीनवाले कपड़े तथा इतिहास। धनी स्त्रियां कानमें सोने की वाली पहनती हैं। मकान अति प्राचीन कालसे ही मालयाकी प्रसिद्धि समी अपसर मिट्टीफे तैयार होते हैं। कहीं कही ताड़के पेड़- स्थानों में फैली हुई है। इसी मालयामें रन्तिदेव राज्य फे यंभों पर ताड़के पत्तोंकी छौनी देनी जाती है । घरमें फरते थे और दशपुरमें (जिसका वर्तमान नाम दशोर । पसे अधिक दरवाजे या झरोग्ये नहीं होते। मध्यम या मन्दशोर है ) इनको राजधानी यो । इनकी दूसरी श्रेणोके गृहस्थोंका गुजारा १० या १२ स०में चल जाता राजघानी उज्जैनमें भो थो यह केवल समृद्धिगाली नगर है। धनी रुपकोंका ५.६ २०में परिवार-सच चलता है। होने के कारण ही प्रसिद्ध नहीं, परन् यहां महाकाल और जुगर हो यहाँको मुख्य फसल है। इसके अलावा ओंकार पौराणिक देवता हैं। इसलिये उज्जैन सात मोक्ष गेहं. जी, चना, वाजरा, पटमन, ईख और अफीम भी यहां स्थानोंमें एक है तथा एक प्रधान तीर्थ गिना जाता है। अवन्तो और उज्जन देखो। उपजती । कात्तिक और अगहनमें खेत जोत अफीम- का वीज योमा जाता है। बहुत पुराने समयमें मालवा या मयन्ती राज्य भारत- चायल म०में १. मेर, जुमार १ मन, गेहूं. २२ सेर, । का एक प्रधान नगर समझा जाता था। मति नमक ८ सेर और मकई १ मन ५ सेर मिलती है। एक प्राचीन कालमें इसका आकार कितना बड़ा था, इसका एक ईख दो पैसेसे फममें नहीं मिलती। महुएको शराष--- कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता, नी भी इतना निश्चय नोपाई योतलफा चार मानेसे छः माने तक । पको तौल है, कि माकिदन घोर सिकन्दरको समयमें यह कदी भी काममें नहीं लाई जाती। भित्र भिन्न स्थानमें | राज्य बहुत बड़ा था । यहाँ तक कि पायका दक्षिण - मिन भिन्न तौल है। ग्राह्मण और यनियेको छोड़ दूसरी भाग भी मालय जातिके अधिकार में आ गया था। दुसरी जातिकी स्त्रियां खेत पर काम करने जाती है। ये मालूम होता है, कि धौद्धकालमें जो भारतफे राजनक एक या दो सेर भन्न प्रतिदिन पाती हैं। यत्ती हुए नाहे उन्होंने या उनके पुबने किसी समय ___यर्तमान समयमै मालपामे रेल लाइनके खुल जानेसे मलयाका शासन किया था । जैन इतिहासमे मालूम साने थाने यदी सुविधा हो गई है। साथ साथ सभ्यता होता है, कि चन्द्रगुप्तने मालयाको अपने साम्राज्य भी फैल रही है। अफीम और सं ही मालयाको प्रधान मिला लिया था । पीछे उनके लहफे दिग्दुसार और एकतनी है। गुजरातफे साथ गौ आदि पशुओका व्यापार बिन्दुसारफे लड़के गशोक दोनोंने दो कुछ समय तक उल्लेखनीय है। यहांका शासन किया । राजा प्रियदोंके अनुशासन