पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५८५

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पालेरकोटला---गालो ५३ है। इसके उत्तरमै लुधियाना जिला तथा थाकी तीन अनन्तर महम्मद इब्राहिम सा १८७७ ६०में राज. दिशाओं में पतियाला राज्य विस्तृत है। तख्त पर येठे। इनका जन्म १८५७ ई०में हुमा था। इस स्थान के नवाव अफगान-बंशके हैं। इनके पूर्व दुर्भाग्यवशतः उनका दिमाग खराब हो गया, इस कारण पुरुप मुगलबादशाहके अधीन सरहिन्दके शासनकर्ता राजफार्य अधिक दिन चला न सके। पीछे उनके लड़के थे। पीछे १८वीं शताब्दीमें मुगल साम्राज्यके अवसानके महम्मद अहाद अली खां राजसिंहासन पर अधिरूढ़ समय घे लोग धीरे धीरे स्वाधीन हो गये। १७३२ ३०३ हुए। ये ही वर्तमान नबाव है। ११ सलामो तो मालेरकोटनाके नवाय जमाल खां जालन्धर दुआवमें। मिलती हैं। इस राज्यम मालेर-कोटला नामक शहर भयस्थित वादशाही सेनाके माध मिल कर पतियालाके । थोर ११५ ग्राम लगते हैं। नयायको सेनामें ५० घुह सिखराज मालासिंहके विरुद्ध खड़े हो गये। पीछे १७६१, सवार और ४४० पैदल सिपाही, ८ कमान और १६ kमें जमाल खाँन भादशाह दुर्रानीको ओरसे सिखोंके । गोलन्दाज हैं। यहां एक ऐगालो-धर्ना-फ्युलर हाई स्कूल साथ युद्ध किया। इस पर महमदशाहने संतुष्ट हो कर ! और तीन प्राईमरी स्कूल हैं। जमाल खाँको सरहिन्दका शासगकर्ता बनाया। इसके । २ उक्त राज्यका एक शहर । यह पक्षा० ३०३२ लिये जमाल सांके वंशधरोंको निकटवत्ती सिखोंका बहुत उ० तथा देशा० ७°५६०के मध्य विस्तृत है तथा अत्याचार सहना पड़ा था। आखिर जमाल माँ मो लुधियाना शहरसे ३० मील दक्षिण पड़ता है। जनसंख्या मिौके साथ युद्ध में मारे गये। अनन्तर उनके लड़कों- २० हजारसे ऊपर है । शहर दो मागोम विभव है। में सिंहासन ले कर झगड़ा सड़ा हुआ। अन्तम भाखन : मालेर और कोटला लेकिन हाल ही उसके बीच में खो सिंहासन पर बैठे। महादशाहके भारतवर्षसे चले जाने पर पतियालाफे ।

मोतीवाज्ञार स्थापित हो जानेसे योगी को मिला

राजा अमरसिंहने माखन खोके राज्य पर आक्रमण कर दिये गये। पहला भाग मालेरकोटलाशके प्रति- . दिया। भोपनने अपने को अमरसिंह के साथ यह करने । टाता सदयहीन द्वारा १४६६ में और दूसरा में ययाजिद खाँ द्वारा पसाया गया था। धारक शहरके में असमर्थ इन्न सन्धि कर ली। संधि यादसे भीखन । खाने कई यार मिखोंको मदद पहुंचाई थी। इस प्रत्युप- थाहरमें अवस्थित है। शहर में एक हाई-स्कूल, एक कारमें पतियालाफे राजा सायसिंहने मालरेकोटलाके : अस्पताल और पफ मिलिटरी डिसपेन्सरी है। नवावका पन ले यहादुर शाहफे विरुद्ध युद्ध किया था।' मालो-धंगालको मौकायादी और मत्स्यजीवि ज्ञाति- पीछे १७६४ में नानक चंगधर चेदि सादयसिदन ' . विशेष। ये कयत या तोयर (तीवर ) जातिसे सरान्स मालेरकोटलाफे नयायोंके साथ युद्ध ठान दिया। माखिर हैं। सम्सयतः मार्गय ( नौकायाहो मांदी ) शम्दसे इस ए दोनोम मल हो गया। १७८८ से मराठोंको इस प्रदेश माली जातिका नामकरण हुआ है। ये घोर फाले. छोटे में तूती बोलने लगी। जब अंगरेज सेनापति ला लेकने। फदके तथा मजबूत होते हैं। इसलिये शातितश्चापिट १८०५ ६०में होलकरके विरुद्ध युद्धयात्रा की, तथ मालेर इन्द द्राविड़ोय जातिफे घंशधर. तथा गांगेय टेल्टाफे फोरलाके नवाद अंगरेजोंकी भोरसे लीं थे। Rest! आदिम अघियासी अनुमान करते हैं। इनके चकले में रणजितसिंहक मालेरकोटला जीतनेका उद्योग करने बाल, छोटी छोटी म्छ और दाढी तथा होट मोटे होते हैं पर अंगरेजी सेनाने नयायको महायता को धी। किन्तु । र छोटी छोटी नाक और बड़े बड़े नाकफे रेव उत्त. अनु. मंगरेज दूत मेटका अनुरोध करने पर भी रणजित् । मानके उपयुन प्रमाण है। भलाया इसके इनमें यिमिग्न मिहने १८०८ ई० मालेरकोटलाके नवादसे १ लाख ME श्रेणी-विभाग न रहने के कारण ये यंगालफे आदिम अधि. रुपया पलपूर्वक यसूल किया। पोई कर्नल मशरलोगोने । वासी जान पड़ते है। १८० रणजितफ माय सांघ करके मालेरकोटला दिन्दू, भागर मयदार शीर धर्मकमाविक प्रति में नयापकी सदस्यता की।

लक्ष्य रख कर इन्होंने बहुत पुरा उस जातिक

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