पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५८८

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५१४ . मालो-माल्य . अनुष्ठ य क्रियाकलापका अनुकरण किया है । यहां तक , मालोजी-रेणुकास्तोत्रके प्रणेता। , . फि इनमें शालिमान ( आलम्पायन ), वाणपि, यङ्गग | मालोपमा (सं० स्त्री०) अलङ्कारभेद, एक प्रकारका । ऋपि, भरणपि, खोडापि, कार्तिकपि, कुलीनराशि, उपमालंकार जिसमें एक उपभेयके अनेक उपमान होते हैं .. मेपराशि, पमराशि, पुरिराशि, सिंहराशि, शिवराशि और और प्रत्येक उपमानके भिन्न भिन्न धर्म होते हैं । - - उदधि आदि जो सव गोत्र प्रचलित हैं वे भी उसी अनु- इसका लक्षण- फरणके फल हैं। "माप्तोपमा यदकस्योपमानं बहुभ्यत बहुतेरे मत्स्यजीवी राजवंशधरोंको भी इनकी शाखा उदाहरण,- बतलाते हैं किन्तु यथार्थमें वे कोचजातीय हैं, मालोंके “वारिजेनेव सरसी शशिनेव निशीथिनी। .. साथ उनका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। फाटार या यौवनेनेव वनिता नयेन श्रीमनोहरा ॥” (साहित्य द. १०) प्यापारी मालो नामको एक और श्रेणी है जो मछली माल्य (सं० लो०) मालेवेति मालाचतुर्वर्णादित्वात् ष्यम्। नहीं पकड़ती, पर मछली काट कर येचती है । यह मालो १ पुष्प, फूल। २ पुष्पस्त्रक। इसका गुण- .. जातिसे पृथक् तथा मुसलमान धर्मावलम्बी है। "वृष्यं सौगन्धमायुय्य काम्य पुष्टिबलप्रदम् । ___ इनमें सगोत्र या मागोतमें विवाह निषिद्ध | सौमनस्यमलक्ष्मीनं गंधमाल्यनिषेययाम" है। अलावा इसके सात पीढ़ो तक पिएडप्रतिवन्ध- । (चरक स० ५ १०) । कताको छोड़ विवाह देनेका नियम प्रचलित है। उच्च- ३ मस्तकन्यस्त पुष्पदाम, वह माला जो सिर पर .. श्रेणीके हिन्दू जैसा इनमें भी विवाह कार्य सम्पन्न होता धारण को जाय । है। इनमें वहुविवाह प्रचलित है किन्तु छोरी सालीको देवताओंको माला गंधादि दान करनेसे अशेष फल- छोड़ दूसरी किसी भी स्त्रीसे विवाह करनेकी प्रथा नहीं लाभ होता है और अन्तमें उसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। देखो जाती। स्त्रीके बदचलन होने पर उसे स्वामी छोड़ पुराणादिमें माला दानादिके फलका विस्तृत विवरण देता तथा वह जातिसे निकाल दी जाती है। लिखा है। नरसिंहपुराणमें कहा है, वैष्णवगण यदि ___ ये प्रधानतः वैष्णवधर्मावलम्बी हैं। गोसाई इनके | सहस्र जातिपुष्य द्वारा सुन्दर मालाको रचना कर भक्ति दोक्षागुरु होते हैं। पतित ब्राह्मण साधारणतः इनका पूर्वक विष्णुको चढ़ावे, तो कोटिकल्प तक वे सूर्यलोकमें पौरोहित्य करते हैं। जिस नदी में ये नाव खेते या मछली वास कर सकते हैं। जातोपुष्पंके साथ कपूर दान करने पकड़ कर जीविका निर्वाह करते हैं उस नदीको ये बड़ी से और भी अधिक पुण्य होता है। स्कन्दपुराणमे लिखा भक्तिके साथ समय समय पर पूना देते हैं। श्रावण | है, कि थोड़े खिले हुए मालती पुष्पको माला बना कर मासके महोत्सवमे मालाकुमारीको पूजा करनी होती है। हरिके मस्तक पर चढ़ानेसे अश्वमेधका फल लाभ होता नदोके किनारे ही ये प्रधानतः शवदाह करते हैं। तीस है।. कार्तिक मासमें मालतीकी मालासे यदि हरिको दिनमें श्राद्ध होता है। उसके बाद जातिका भोज होता | अर्चना की जाय, तो वैष्णवको मृत्युभय नहीं रहता। है। अनन्तर एक वर्ष तक प्रति मास एक एक मासिक . "मालती कलिकामालामीपद्विकसितां हरे।। तथा वर्ष वर्षमें वार्षिक श्राद्ध होता है। किसी व्यक्ति स्वर्णलक्षाधिक पुष्प माला कोटिगुणाधिका ॥" . की यदि अपघात मृत्यु हो जाय, तो चौथे दिन तथा| (हरिभक्तिवि०) इकतीसवें दिन में शेष श्राद्ध होता है। , . "दत्त्वा शिरसि विप्रेन्द्र ! वाजिमेधफलं लभेत् ॥" . ' हिन्दू-समाजमें ये विशेष हेय समझे जाते हैं। ब्राह्मण इसके हाथका जल ग्रहण नहीं करते । ये कैवर्त और सुन्दर सुगन्धित पुष्पोंकी माला घना कर देवताको तोवर जातिसेनीच हैं। समर्पण तथा स्वयं धारण करनेसे धर्म तथा स्वास्थ्य मालोक-एक प्राचीन कवि। । दोनोंकी उन्नति होती है। उत्तम माला धारण करने