पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५८९

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पाल्पक-माल्यवान् ५१५ मानसिक और शारीरिक शक्ति बढ़ती है, ऐसा शास्त्रों में । सोऽय गैस कभनुरभिमाल्यवान्नाम यस्मिन् । कहा है। माला पहन कर स्वयं उसे गलेने उतार न नौलस्निग्धः श्रयति शिखरं नूतनस्सोययाः ।। फेंकना चाहिये तथा फेनों के बाहर भी माला धारण | (उत्तर रामचरित ) निषिद्ध है। सिद्धान्तशिरोमणिके मतसे यह पर्यंत केतुम ल गौर "नाश्नीयात् संधिवैशायां नगच्छेन्नापि संविशेत् । इलावृत वर्ष के सीमापर्यतरूपसे निर्दिष्ट है। नोल और न च प्रक्षिखेद्भमि नात्मनोपाहरेत् सजम् ॥" निषध पर्वत तक इसका विस्तार है। , "न हि गर्ष को कुर्यादेवहिर्माल्य न धारयेत् । राक्षसविशेष । यह राक्षस गन्धर्वकन्या देव. • गवाव यानं पृष्ठेन सर्वधौर विहितम् ॥" (मनु ४ भ०)। यतोके गर्भसे राक्षस सुकेशके गौरसमे उत्पा हुआ न च माला धृता स्वयमेवारनयेदर्थादन्येनापानयेदिस्युन- है। इसके भाईका नाम सुमाली था । इसी सुमाली- मिति, केशकलापाद्वहिर्माख्य' न धारयदिति च ।' (पृष्ठ क) | की कन्या निकपाके गर्भसे विश्वविख्यात रापणका जन्म . अपने हागसे उठा कर माला नहीं पहनना चाहिये, हुमा धा । (रामायण उ०६ स०) (त्रि०) ३ मालाविशिष्ट, इससे कोई फल नहीं होता, बल्कि पति शीघ्र श्रीम्रए ! जो माला पहने हो। होना पड़ता है। माल्ययती ( स० स्त्री० ) पुराणानुसार एक प्राचीन नदी. "स्वय' माल्य' स्स्य पुष्प' स्वय' अश्य चन्दनम्। । का नाम । (नि.)२ जो माला पहने हो। नाषितस्प रहे कौर' कादपि हरेत् मियम ॥" मास्ययन्त (सपु०) माल्यवान देखो। (कलोचन) माल्यवान (मालवान् )-वम्बई प्रदेशके रतगिरि जिला. ग्निपुराणमें लिखा है-श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को न्तर्गत एक उपविभाग। यह अक्षा० १६१ से १६१६ निमन्त्रण फर यदि गन्धमाल्यादि द्वारा उन्हें प्रसन्न उ० तथा देशा० ०३२० से ७३ ४१० मध्य अय- किया जाय, तो भगवान उस पर बहुत सन्तुष्ट होते हैं। स्थित है। भूपरिमाण २४० घर्गमील और जनसंख्या भामन्त्रयिल्ला यो विमान गन्धमाल्य मानपः। लाखसं ऊपर है। इसमें मालवान नामक एक शहर तर्पयेच्या युक्तः स मामय यते सदा" (भग्निपु०) और ५८ ग्राम लगने हैं। इसके उत्तर देवगढ़ उपविभाग माला पहा फर याहर नहीं जाना चाहिये। पूर्वमें सामन्तवाही-सामन्तराज्य, दक्षिण में कालीगाड़ी "वहिर्मास्य वहिर्गन्ध मार्यया सह भोजनम् । और पश्चिममें गरव-सागर है। विभृत्यवाद' कुत्या या प्रवेशव वियजयेत् ॥” (कुर्मपु०) रतगिरिका अधित्यकामय उपकलमाग ले कर यह माल्यक (सं० पु०) १मदनक्ष, दौनेका पेड़ । २ माला। उपविभाग संगठित है। इसके मध्य हो कर कोलम्य माल्यचन्दन (सं० ली.) सामानाई व्यक्तिको सम्मान और फालावली साड़ी चलो गई है। इस उपविभागके रक्षाफे लिपे प्रदत्त मालावन्दनादि यस्तु । मध्यदेश में जंगलोंसे आच्छादित गिरिमाला शोमा देती माल्यगुण (सं० पु०) मालाका गुण । है। पथरीली जमीन होने पर भी फमल अच्छी लगती माल्पजीयक (सं०पु०) मालाकार, माली। है। काली और कालावली पाडीके निकट धान गोर माल्यपिएडक (सं० पु०) माल्यगुच्छ । ईप बहुतायतसे उपजती है। मालपान उपसागरफे माल्यपुष्प (सं० पु०) मालाकाराणि पुपाण्यस्प। शण- राजकोट अन्तरोपमें स्टोमरों के रदने के लिये एक सुन्दर पृक्ष, सनका पेड़। । बन्दर है। उक्त दोनों बाड़ी छोरी छोटो नाये २० । माल्यवृधिका:( सं० खो०) मास्यपुष्प फन टाप, मत! मोल तक माल ले कर गातो ज्ञाती है। मालयान उप- इत्यञ्च ।, शपपुष्पी। शणपुमो देखो। । फूलस्थ देमगढ़, पारड़ा और मान्यवान् पन्दर में याणिज्य माल्यवत् ( स० पु०) माला-मतुप मस्य यः। १ पर्यंत जोरों चलता है। विशेष २ उत्त. उपविभागका एक नगर । यह असा.