पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५९०

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पाल्यवान्-माला (मल्लाह) ६१३ उ० तथा देशो०७३' २८ पू० रत्नगिरि शहरसे ,माला (मल्लाह)-धोवर और नाव चलानेवालो जातियों ७० मील दक्षिणमें अवस्थित है। जनसंख्या २० हजार की एक जाति । बङ्गाल और विहार प्रदेशकी नाव है। माल्यवान् उपसागरके सम्मुख भागमें पर्वतसंकुल चलानेवाली जाति माला या मल्लाह नामसे परिचित हैं। छोटे छोटे द्वीप रहनेके कारण नावे घड़ी सावधानीसे ले इस समय उत्तर-भारतमें कई निकृष्ट जातियां भी मलाह जानी होती है । इन पर्वतज द्वीपोंमें जो बड़ा द्वीप है उसमें | नामकी एक स्वतन्त्र जाति हो गई हैं। इन्होंने अपना महाराष्ट्रकेशरी शिवाजी द्वारा प्रतिष्ठित इतिहास प्रसिद्ध अपना एक एक दल कायम कर लिया है । जातीयतय सिन्धुगढ़ तथा पागढ़ नामक दो डुर्ग मौजूद हैं। पद्म- का अनुसन्धान करनेवाले सेविङ्ग साहयने. बङ्गालफे गढ़ अभी भग्नावस्थामें पड़ा है। इसके पीछे और भो मल्लाहोंमें मलाह, भूरिया या भुरियारी, पाण्डवी, या यध- एक छोटे द्वीपमें प्राचीन मालवान् नगर प्रतिष्ठित था। रिया, चैन या चे, सूगारा, गुरिया, तोयर, फुलवत्, केवट . अभो चर पड़ जानेसे यह द्वीप भारतवर्ष में मिल गया (खेवट ) आदि दल निर्देश किये है। उत्तर-पश्चिम- है। वर्तमान माल्यवान् नगर भी अभी पहलेके जैसा भारतमें मल्लाह, केवट, टिमर, कर्वाक, निषाद, मछपाहा, समृद्धिशाली नहीं रहा। उसका बहुत कुछ अंश हट । मांझी आदि जातिके लोग नावें चलाते और धोयरका फूट गया है और यहां ताड़के बहुनसे पेड़ दिखाई देते। व्यवसाय कर मल्लाह नामसे पुकारे जाते है । ये द्रावि- हैं। नये नगरके मध्यस्थल में एक ऊंची भूमिके। डीय जातिसे सम्पूर्णतः अलग हैं। ऊपर राजकोट दुर्ग अवस्थित है। उसके तीनों ओर मल्लाह अपनेको विन्ध्यवासी निपादोंके 'वंशधर समुद्र-उपकूल है। मराठा-डकैत इस दुर्भद्य दुर्गमें रह बतलाते हैं। ऋक्संहिता, रामायण और महाभारतके कर अपनी दस्यु वृत्तिको चरितार्थ करता था। १८१२ नलोपाख्यानमें इस निपाद जातिका नाम दिखाई देता ईमैं करवीरको सन्धिके बाद कोल्हापुरके राजाने यह है। यह जाति नलके राजत्वके समय विन्ध्य और दुर्ग अगरेजोको समर्पण किया। उसो साल अंगरेज- ऋक्ष-पर्वतके करिदेशसे विदर्भ और कोशल राज्य तक सेनापति ब्युनल स्मिथने यहांके डकैतोंको समूल निमल फैल गई थी। गङ्गातीरयत्ती शृङ्गवेरपुर नगरमें इस किया था। जातिका वास था, जिसका रामायणसे ही पता चलता इस नगरके पास ही लोहेकी एक खान पाई गई है। है। श्रीरामचन्द्र जय शृङ्गवेरपुरमें पहुंचे तव निपाद- पानमा तयार होता है। शहरमें एक सव-जजकीत सादर-सत्कार किया था। मनु महाराजन अदालत और ११ स्कूल हैं जिनमें २ वालिका स्कूल हैं । निपादोंको मार्गव नामसे उल्लेख किया है। माल्यवान् -राक्षप्तविशेष। यह मालो और सुमालीका पाथमा या श्रीवास्तव मलाह कहते हैं, कि घे भाई था। इसके पिताका नाम सुकेश और माता गन्धर्व श्रीवास्तव कायस्थ थे और श्रीनगरमें वास करते थे। कन्या चेदयती थी। यहाँके राजाने इस जातिको एक सुन्दरी कन्याका पाणि- माल्यवृत्ति (स० पु० ) वह जो फूल और माला येच फर अपनो जीविका चलाता हो। ग्रहण करनेकी इच्छा प्रकट की, किन्तु इस जातिने अस्थी. माल्या ( स० स्त्री० ) तुणभेद, एक प्रकारको घास, फार कर दिया। इस पर राजाने इस जातिको अपने माल्यापण (स० पु०) माल्य-विक्रयस्थान, फूलको दूकान । राज्यसे निकाल दिया। इसी समयसे किसी निविड़- माल्ल (स'० पु० ) मल-चातुरर्थकत्वात् अन् । वर्णसंकर बनके पार्वत्य प्रदेशमें यह जाति आ कर रहने लगी। जातिविशेष । यह जाति ब्रह्मवैवर्तपुराणमें लेट:पिता गौर 'यहां इस निकृष्ट वृत्ति अवलम्बनसे ही अपनी जोयिका- धोयरी मातासे उत्पन्न कही गई है। निर्वाह किया करती है। ' माल्लयारतय (सं० त्रि०) मल्लवास्तु-सम्बन्धीय । ____ गाय-उपत्यकाकी पूर्व ओरके अधिवासी मलाही. माललयो (म स्रो० ) मल्ल स्वार्थ भण। मल्ल यात्रा, का कहना है, कि चित्रकूट पर्वत पर आनेके समय उनके मलाकी विद्या या कला। | पूर्वपुरुष दशरथ-तनय रामचन्द्रको नदी पार कराया था।