पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५९२

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५१८ माला ( मल्लाह)-मावलोकर जय कन्याके घर वारात जाती है, तव गणेशजीको । दश पिण्ड और स्त्रियों के लिये. नौ दिनमें नी पिएड . पूजा की जाती है। यहां गृहदेवता और पितृपुरुषगणके देने पड़ते हैं। यहां ब्राह्मण या महापात आ कर यज- लिये प्रदान (देवता और पितरका नेवतना) आदि शुभ मानी वृत्ति करते हैं। वर्षमें जो श्राद्ध करते पंह 'वरपी' काँका अनुष्ठान होता है । क आ कर कन्याके ग्राम- | नामसे विख्यात है। वरखी या वरपीमें ये केवल दो पिण्ड में उसके लिये नियत स्थानमें ठहरेगा। यहाँ नाइन पर देते है। पुत्रहीन व्यक्तियों के लिये एक हो पिण्ड देने कन्याका 'गेट बन्धन' करती हैं। पांच बार प्रदक्षिणा की व्यवस्था है। कोई कोई गयाधाममें जा कर पिएड.' करनेके वाद यानी पांच बार भावरि फेरनेके बाद वर दान करते हैं। किसी दूर देशमें मरने पर "नारायण मांगमें सिन्दुर प्रदान करता है, बस विवाहको विधि हो । वलिरूप"-श्राद्ध किया जाता है। गई। इसके बाद यहां स्त्रियोचित रश्म-रिवाज शुरू होता . महादेव, काली, भगवती, महावीर, गङ्गा, महा. है। विवाह हो जानेको बाद वर कन्याको घरगे लाये लक्ष्मी, महासरस्वती जटाईवावा, मशानदेवी, पांचो. जाते हैं। यहां पर शिरसे मौर (मयूर) उतार कर पोर, परिहार, गांजीमियां आदिको पूजा करते हैं । दश- दही और मिष्टान्न खाता है। इस समय घरसे बोलो हराके दिन ये गङ्गाजीकी पूजा करते है। सिवा इसके उनोली करनेवाली खियां हंसती, वोलती और तरह तरह वीमारी होने पर ये वोरतियां चोरकी पूजा किया करते का मनविनोद कर बरका मनरञ्जन करती हैं। जब घर माता शीतलाकी पूजा मिष्टामसे की जाती है। दर लौट कर घर आता है, तव विवाहकी खुशी में गंगाजी-| देशकी यात्रा करने पर नावको माला पहना कर उसको की पूजा करता है । उसो दिन कंकण आदि खुलता है। पूजा मोर होम भी करते हैं। इनमें विधवा विवाह प्रचलित है। यह सगाई, धरौना| माल्य (सं० क्लो०) मूर्खता, विवेकहीनता। . और बैठकोफे भेदसे तीन प्रकारका है। स्वामीके कनिष्ठ माल्ह (सं० पु.) १ मल देखो। (स्त्री०) २ माल देखो। भ्राताको पुनः पति बना लेना इनका फत्तव्य है। किन्तु गावत् (सं० वि०) मत्सरा, मेरे जैसा। इसका देवर बहुत छोटो उम्रका हो, तो यह वाध्य हो कर दुसरा पति कर लेती है। मायल-वग्यई प्रदेशान्तर्गत सह्याद्रिके समीप पूना जिले. ___ यदि कोई रमणी वन्ध्या या गृहकर्म करने में असमर्थ का एक महकूमा । यह अक्षा १८३६ से ले कर १६' उ० हो, तो उस स्त्रीको सहायतार्थ सगाई करके पुरुप दूसरी 'तथा देशा० ७२ ३६ से ले फर ७३ ५१ पृ०के बीच विधयाका पाणि-प्रहण कर सकता है । किन्तु साधा- पड़ता है। क्षेत्रफल ३८५ वर्गमोल है। इस स्थानका रणतः जिनकी पत्नियां मर चुको है,चेही विधवा विवाह अधिकांश जंगलामोर्ण है यहां की मिट्टी मटमैली और करते हैं। पुरुषोंके नावोंको ले कर देश विदेश चले | लाल है। इन्द्रायणी और अन्ध्रा नामकी दो प्रधान नदी जाने पर इनको स्त्रियों का आचरण ठोक नहीं रहता है। महकूमे हो कर यह गई है। धांगड़, फुलो, माली, माङ्गा इसी कारणसे स्त्री-त्याग, भोजकी अधिकता तथा सगाई | माड़, कुणयो आदि जातियां इस प्रदेशमें कृषि कार्य की प्रथा कायम है। करती हैं । मेट इण्डियन पेनिनसुला रेलवे लाइन इसी हो । ___ स्त्रोंके गर्भ धारण करने पर किसी संस्कारको आव: । कर गई है । यहांके पहाड़ो प्रदेशमें विशापुर और लौह श्यकता नहीं होती। पुत्र होने पर छः दिनमें और कन्या | · गढ़ दुर्गका भग्नावशेष देखा जाता है। उत्पन्न होने पर आठ दिन में पष्ठो पूजा होती है। पाठवें दिन मावली-दक्षिण भारतको एक पहाड़ी वीर जातीका नाम । 'भशौचान्त होने पर पण्डित था कर लड़केका राशि नाम | 'इस जातिके लोग शिवाजीको सेनामें अधिकतासे थे। कह देते हैं । आठ वर्षकी कम उम्रके घालकके मरने पर .. . माझवीसैन्य देखो। उसे जगीनमें गाड़ देते हैं। जमीनमें यहीं' गाड़ते हैं, मावलोकर-मान्दाज प्रदेशके सिवाकोड़ जिलेका एक • जहां गड़ा नहीं है, जहां गङ्गा है यहां गङ्गाजी में फेंक देते तालुक और उसका प्रधान नगर। इसमें १४५ 'माम है और उसका श्राद्ध नहीं करते। पुरुषके लिये दश दिनमें लगते हैं। नगर में एक प्राचीन दुर्गका संहर देखा जाता ,