पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५९५

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मापयोनि-मास ५२१ ____ . . "यों जयत् कानि सर्वेशे सर्वभूतममाने । । मापान्न (सं० क्ली०)मापकृत अन्न । इसका गुण-दुर्जद . . रत मा निज भतेभ्यो बलिं गृह शिप्रिये ॥ मांसवृद्धिकर, गुर, वातनाशक गौर गृय । (या) । एप मामसनवनिः भों काल्यै नमः ॥" | मापाश : सं० पु०) मध्य, घोड़ा। प्रार्थना-मन्त यथा- मापिक (सं० पु० ) १ जोयशाक । (वि०) २ माप परिमित भों मातर्मात रे दुर्गे सर्वकामार्थ साधिनि । मापिण (सं० छो०) मापाणां भयनं क्षेत्रम् । मापका खेत । अनेन वनिदानेन मर्वान् कामान् प्रयच मे ॥" (पत्यतत्त्व । माघेण्डरि (सं० स्त्रो०)मापपिष्टयिति । मापयोनि सं० पु०) खायद्रय्यभेद, पापड । मापोण ( सं०नि०) मापेन ऊनः । पक माशेसे कम । मापरा (सं० सी० ) मांड, पोत्र । माध्य (सं० पु०) माप वोने योग्य वेत, मगार। मापरायि (सं० पु० ) लाट्यायन सूत्रानुसार एक ऋषि- मास (सं० पु०) माह गाने ( सर्वधातुभ्योऽमुन् । उप ४१८५) 'का नाम । पेमापरायिन् पिक गोत्रमें थे। इत्य-सुन्। १ चन्द्रमा। २ मास, महीना । मापयटी (सं० स्त्रो०) वाटिकीपधभेद, उड़दको वनो हुई "चनु मासि कर्तध्य शिशोनिष्क्रमण गहात् । बड़ी । यही देखो। पटेऽभप्राराने मासि यहोर मा कुले ॥" (मनु स३८) मापाईक (सं० पु०) मा पर्द्ध यतीति वृद्ध णिच ण्वुल । (लो०) ३ मांस, गोश्त । वर्णकार, सुनार । | मास (सं० पु०) मस् परिमाणे भाये घम् । १ मास मापशस् (सं० म०प०) मापं मापं ददातीत्य मास शस्) परिमाण, माशा 1 मस्पते परिमीपते असी गनेन येति प्रतिमाप, गफ एक उड़द करके। मम् घम् । १ शुभ ष्ण पक्षवयात्मककाल, महीना । मास मापसूप (सं० पु०) भृष्टमाप प्रस्तुत युप, भूने हुए उड़दका १२ होता है। मास समयका अशयिशेष है । युग, य, जूस । इसका गुण-स्निग्ध, पृष्य, वायुनाशक, उष्ण, तु, मास, दिन, दण्ड आदि सगी अखएड दण्डायमान सन्तर्वण यलकर, सुस्यादु, चिकारक। काल या समयफे राश हैं। माधान (सं० पु०) मापमत्ताति अद् अण । १ कच्छप, मलमासतत्त्वमें मासका विशेष विवरण लिया कागा। (लि. )२मावभक्षक, उड़द खानेवाला। गया है। इसीसे यहां संक्षिप्त विवरण दिया जाता है। माषादिकाय (सं० पु०) वैद्यकके अनुसार एक प्रकारका | मास या मदीनेको चार भागोंमें विभक्त किया जाता है। काढ़ा जो पक्षाघातरोगमें उपयोगी माना जाता है । प्रस्तुत, जैसे :-१ सीरमास, २ चान्द्रमास, ३ नासलमास और प्रणाली-मारकलाय, अलकुशी, भरेएडका मूल, विश- ४ साधनमास। घंद भीर जटामासी, कुल मिला कर २ तोला ले कर १ सौरमाग-सूर्य जितने दिनों तक रक राशि- आध सेर जल में पाक फरे । जर आध पाय जल यव रहे, में रहते है, उतने दिनोंका एक सौरमास होता है। सूर्य • तप नीचे उतार ले। पीछे अपरमे १माना होंग और १ को गति सो मासको नियामक दै, इसीसे इसका नाम , माशा संधर डाल दें। प्रति दिन यह काढ़ा पीनेसे पक्षा- सौरमास है। सौरमास २६, २०२१ और २२ दिनों का • घात रोग जाता रहता है। भो होता है। इसमे कम और भधिक नहीं होता । पर- मासाशितल (सं० झो०) तेलौषधभेद । प्रस्तुन प्रणाली - देशमें इसी महीनेका व्यवहार होता है। माल और -तिल तेल ४ संर, चूर्णके लिये मापकलाय, अलकुगोका काद इसी सौरमाससे हुमा करना है। योज, गतीस, भरएडका मूल, रास्ना, शतमूली मौर। २ चान्द्रमास-सिविघटिन मासको दो चान्द्रमास संधय कुल मिला कर १ सेर काढ़े के लिये मापकलाय करते है । यह चन्द्रमास फिर दो गरदका १, १६ सेर, जल ! मन २४ सेर, शेष १६ सेप विजनंद १६ / १ मुगमचान्द्र और २ गौणघाद्र । शुक्पक्षको प्रतिपदास सेर. अल १मन २४ मेर शेष १६ मेर। इस तेलका यया- अमावस्या तर इस ३० तिथियाँसे जो चान्द्रमास होता यिपान पाक कर मेयन करनेसे पक्षापात दर होता है। ! ६ पद मुण्य चान्द्रमाम और कृष्णपक्षकी प्रतिपदास Vol, X 1. 131