पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५९९

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पासवचिका-पासाहार ५३७ समुझय मएड, एक प्रकारका पेय पदार्थ जो चावलफे। "मामान्ते म्रियते कन्या विम्यन्ते स्यादपुषिणी । मांड और अंगुरके उठे हुए रससे बनाया जाता था। नपान्ते च वैधव्य रिह या मत्यु योर्भयेत् ॥ इसका प्रयोग यक्षोंमे तथा यह मादक होता था। मासान्ते दिनमेकन्तु तिष्यन्ते घटिकादयम् । पर्याय -आचाम, निस्राव ।२ कालिक, कांजी। पटिका रितय मान्ने विवाह परिवर्जयेत॥" मासत्तिका ( स० स्त्री०) सर्पपो नामक पक्षिविशेष, (समाना) मासापयर्म संत्रिक) एक महीने तक। श्यामा या पईकी जातिका एक पक्षी। मासालर -भिक्षाजीयो जातिविशेष। कर्णाटप्रदेशमें इनका मासद्धि (सं० सी० ) १ कोरण्ड अध वृद्धिका रोग। अधिफ वास देखा जाता है। मान्द्रामके नाना स्थानों में २ गलगएडादि, घेमा। मासल ( स० वि०) मास सिध्मादित्यात् लच । पे लोग भीख मांगने जाते हैं। पहले पेनागुण्डो और मांसल, मांसयुक्त, हट्टा फट्टा । हिन्दूपुरमें इनका धाम था। १८७६ १०फे घोर दुर्मिनके समय पे लोग धारवार जिलेमें आ कर घस गये। तेलगू, मासशम् ( स० अश्य० ) प्रति मास, हर एक महीना। और मिन कनाड़ी मापा पे वोलचाल करते हैं। जब माससञ्चपिक ( स० वि०) एक महीने तकके लिये संचय किसी गांयमें ये जाते, तब लादोगर या माजातिके घर किया था। माश्रय लेते हैं । इनका विश्वास है, कि ये लोग भी इसी मासस्तोम (सं० पु०) पकाहभेद, एक प्रकारफा एकाह माङ्गवंशसे उत्पन्न हुए हैं। ये लोग गदहेको पालते हैं। जब कमी बाहर निकलते, तब उसी गदहे पर अपना मासा (सं० पु०) माशा देखो। कपड़ा लत्ता लादते हैं। ये लोग भेडे, मुगी, मरे येल, मांसाधिप (सं० पु०) मासानामधियः । मासाधिपति, यह गाय, मैं स सूगर भादिक मांस खाते हैं। राय इन मह जो मासका स्वामी हो। चन्द्रसे उर्ध्य कक्षामसे लोगोंको बहुत प्रिय है। ये रस्सके ऊपर नाच विमा जो सय प्रद स्थित है, ये हो विश दिनात्मक मासके कर पैसे कमाते हैं। यिपाहमें ३०) से अधिक यपया अधिप या स्यामो कहे गये हैं। उक्त कम या-चन्द्र, खर्च नहीं होता जिसमें १५) २० लड़को पापको देना घुध, शुक्र, रवि, मंगल, वृहस्पति और शनि ।। "ऊर्ध्व मेण शशिनो मासानामधिराः स्मृताः।" होता है। तिरुपतिक छूटरमण इनफे उपास्य यता (सर्य सिद्धान्त १२७६) है जो चतुर्भुज तया शङ्ख, चक, गदा और पमधारी है। प्लेगको अधिष्ठात्री दुर्गाग्मा देयोकी भी ये लोग पूमा मासाधिपति (सं० पु०) मासस्वामी, प्रह। मासानुमासिक (सं० वि०) प्रति मास सम्बन्धी, प्रति __करते है। पूजाफे समय ब्राह्मणको अमन नहीं पड़ती। इनके कोई दीक्षागुरु भी नहीं हैं. मासका। पे लोग जातवालय पार्थ देशमै तालौह शलाका. मासान्त ( सं०पु०) मासस्य अन्तः। एक महीनेका अन्त ।' से x ऐसा चिन्ह लगाते हैं। पीछे प्रसूति और बालक- , २ अमावस्या, मासके अन्तमें यात्रा यना कर कहीं नहीं। । को स्नान कराया जाता है। इनका विश्वास है कि इस. जाना चाहिये। सो इसमें यात्रा करते हैं उनको मृत्यु , से भविष्य वालक पर कोई आपत्ति नहीं आ सकती। दोती है। "पशान्त निकमा यात्रा मासान्ते गरम भ वम " विवाह समय दुदियों और थेटरमणको पूमा होती नि बाल्य यियाह भार विषयायिवाह प्रचलित है (समया ).. जनन या मरणमें कोई भी भगौच नहीं मानता। इनकी ३ संपान्ति दिन । इस दिन वियाह होनेसे कन्याको ' मृतदेह गादी जानी है। मृत्यु होती है। सुतरां पियाइमें यह दिन प्रशस्त महीं मासायधिक (स.वि.) मास पर्यन्त, एक महीने हक । माना गया है। मासके अन्तमें एक दिन छोड़ कर 'मामाहार (म. वि. क मास अन्तर भोशनकारी, विवाहका दिन स्थिर करना होता है। ! एक महीने के बाद मीलन करनेवाला।