पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/६०८

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५६ पाही-पाहुली बहुनौका विभ्यास है, कि उड़ीसामें जिस गजपतिवंशने (पु.) २ एक प्रकारका फारचोवीका काम जो वीचमे रामत्व किया था और इस समय भी मयूरभक्ष आदि उभरा हुआ और इधर उधर ढालुमा होता है। . विभिन्न स्थानों में जो क्षत्रिय या राजपूत राजे राज फरमाही मरातिय ( फा० पु०) राजाओंके आगे हाथो पर रहे हैं, ये सय माहिप्य हैं और मेदिनीपुरके विभिन्न चलनेवाले सात भएड जिन पर अलग अलग मछली, गों के अधिपति माहिय फैयत्तीको जातिके हैं। किंतु सातो प्रहों आदिकी आकृतियां कारचोयोको पनी होती कहना यह है, कि यह अमूलक विश्वास मित्तिहीन है। हैं। इस प्रकारके झंडोंका भारम्म मुसलमानों के राजस्व उदोसाके गठवंशीय और गजपतिवंशीय राजाओंके यहु कालमे हुमा था । सूर्य, पक्षा, तुला, अजगर, सूर्य. तेरे शिलालेख और तानपन मिले हैं। इनसे मालूम मुखी, मछलो और गोलें ये सात शकले भएडों पर होता है, कि ये चन्द्र और सूरघंशीय हैं। मयूरभक्षका होती हैं। राजवंश भी पैसे हो चन्द्रवंशीय क्षत्रिय है धीर तो माहुण्डक भट्ट-एक प्राचीन कपि । । फ्या उडोसाका कोई राजा अपनेको माहिष्य नहीं फहते । माहुदा-हजारीबाग जिलेके करणपुर परगनेका एक बड़ा उड़ीसाके राजाओंका "मादिप्य" होना लिखना आधु- पहाड़। यह हजारीबागसे ४ फोस दक्षिणमें अवस्थित निफ यङ्गीय फपिपोंकी फेवल कल्पना है। अतपच है। इसको ऊचाई ८०० फुटसे २४३७ फुट तक है। उड़ीसाका राजवंश और मेदिनीपुरके फेवर्श राजवंशको दूरसे इसका दृश्य यड़ा हो मनोरम है। चोटोका ऊपरी एक जातीय नहीं कहा जा सकता। ! भाग ठीक अर्द्ध चन्द्रफे जैसा है। इसके नीचे गभी खेती भारतवर्ष में श्रेष्ठ माहिष्य जातिका भव अस्तित्व होती है। नहीं रहा । सम्भवतः यह जाति अवस्थाके अनुसार राजमाहुर (हिं० पु०) विप, जहर । पुत समाजमें अयया अन्य किसी समाजमें मिल गई है। माठुरदत्त (से० पलो. ) नगरभेद । पालिद्वीपमे भय भो माहिप्य जातिको वस्ती है । क्षत्रिय माहुल (सं० पु०) मदुलका गोत्रापस्य । फे घीर्य और वैश्यकन्यफे गर्भसे इस जातिको उत्पत्ति माहुल-युक्तपदेश भाजमगढ़ जिलेको एफ तहसील । । थालिदोपमें आज भी उस मुप्राचीन हिंदूसमाजका यह शक्षा० २५४८ से २६ २७ उ० तथा देशा० . ८२ भादर्श विद्यमान है। यहांफे माहिन्योफ आचार-व्यय ४० से ३७०के मध्य अवस्थित है। भूपरिमाण धार क्षत्रियों की तरह है। यहां यहुतेरे स्थानामि ४३६ वर्गमील और जनसंख्या ३ लाग्नसे ऊपर है। इसमें माहियोंका राज्य है। ये अपनेको माहिप्य क्षसिय २शहर मीर १४७ माम लगते है। फनयार नदी इसको कहते हैं। । दो मामेिं योरती है। सभी नदियोम टोस बड़ी है। मादी ( हि खी०) दक्षिण देशको एक मदीका नाम ओ | माली-यम्बईप्रदेशके सतारा जिलान्तर्गत एक बहा जम्मातको साड़ी में गिरती है। गाय । गायर्फ योचमें हेमापन्थियोंका सुप्रसिय कदम्य माही (फा० खो०) मछली। देवीका मन्दिर विद्यमान है। मन्दिरफो मंचाई ४० फुट' माहोगीर ( फा० पु०) महुभा, मछली पकड़नेवाला । और परिधि २० फुट है। इसका मण्डपांश भास्कर माहोन (सं० पु. ) महत्, उत्कृष्ट । शिल्पसे पूर्ण है । उत्तरमे परशुरामको गोदमें लिये महिपा. मादीपुस्त (फा० यि०) १ जो मछलीकी पीठकी तरह | सुरीदेवी, पश्चिममें नरसिद-मति भौर दक्षिणमै गजा. पीचर्म उमरा हुआ और किनारे किनारे दालुमा हो। मन, पढ़ानन मादि देवमूर्तियां युदी हुई है। गर्भगृहको देयीर्चिके पाय में महादेवको लिङ्गमूर्ति स्थापित है। माहुली (सङ्गम-माहुली)-म्यांमदेशके सतारा जिलान्त. •Journal of the Koral Asiatic Societys. गत एक नगर । एका मोर पेराया नदीके कारण इसका S.rol.ix.p, 11G. सहममाहुली नाम हुभा है। यह अशा० १७.४२३०