पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/६१३

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सिंहदी-मिङ्गल दिन तक भिगोया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर यह ; देवताके उद्देशसे सूअर और मुगोंकी बलि चढ़ाते हैं। किया दो तीन बार भी की जाती है। नांदमेसे निकाल गांव गांवमे पूजाका निर्दिष्ट स्थान है । वैशारय, कार्तिक फर कपड़ा धोबीके यहां भेजा जाता है। इससे छीटका' और माघ मासके प्रथम दिन पड़ी धूमधामसे पूजा रंग पका और चमकदार हो जाता है। इसे तेलचलाई होती है। •भी कहते हैं। यह जाति भूत और पिशाच आदिकी पूजा करती मिहदी (हिं० स्त्रो० ) मेंहदी देखो। है। भूतोके नाना विभाग , जैसे पहाड़ी, जंगलो और मिाद ( अ० स्त्रो०) मीभाद देखो। जलाधिष्ठाता इत्यादि। प्रत्येक गृहस्थको महीने में दो मिभादो ( म० वि० ) मीआदी देखो। वार फरके गृह भूतको पूजा करनी होती है । इनका मिमान ( फा०वि० पु०) मियाना देती। विश्वास है. कि सभी प्रकारको पीडा भूतों द्वारा हो मिकद (फा स्त्रो० ) मलद्वार, गुदा । । हुआ करती है। मिकदार ( १० स्त्री०) परिमाण, मात्रा। । ये लोग मृत देहको जलाते हैं। प्रेतात्माके उद्देशसे मिकनातोस (फा० पु०) चुम्बक पत्थर । पलि दी जाती है और कुछ दिन तक बड़े समारोहसे मिकाडो--जापानके सम्राट को उपाधि । पान, मोजन, नाच गान होता है । इस प्रकार ये लोग मिकिर-आसामके अन्तर्गत नौगांव जिलेका पहाड़ी प्रदेश। दडे आनन्दके साथ शोक प्रकट करते हैं। किसी मृत् यह स्थान नाला पहाड़के उत्तर अवस्थित है तथा गारो, व्यक्ति के स्मरणार्थ पत्थर स्तम्भ गाड़ कर उस पर वीच पहाईसे ले कर पाटकाई पहाड़ तक फैला हुआ है। दोचौ अन्न जल दिया करते हैं। पूर्वको और इस पहाडको उपलका हो कर धान्य श्वरी । इन लोगों में यौवन विवाह प्रचलित है। जिसकी नदी तथा दक्षिण पश्चिम हो कर दिवं, यमुना और। कपिला यह गई है। ": अवस्था अच्छी है, वह बहुविवाह कर सकता है। दरिद्र लोग विवाह नहीं करते। माता पिता पुत्रकन्या- २ पहाड़ी-जातिविशेष । ये लोग पहले जयन्ती पहाड़ पर रहते थे, पीछे यहांसे उतर कर आसाममें जा कर का विवाह नहीं देते। घर और कन्याके आपसमें यस गये हैं। नौगांवमे कछाड़ तकके स्थानों में इनका प्रणय होनेसे हो विवाह होता है। विवाहके बाद वरको यास देखा जाता है। किन्तु गीगांवमें इनका प्रधान | दो वर्ष कन्याके घर रहना पड़ता है। स्त्रियोंको पुरुप के समान स्वाधीनता दी गई है। लुसाई-युद्ध के समय अहा है। इनकी संख्या प्रायः एक लाख होगी। आसाम- | को पहाडी जातियों के मध्य ये लोग सबसे शान्तप्रकृतिक १८७२ ६०में इन्होंने फुलीका काम करके गवर्मेण्टका और परिश्रमी हैं। दूसरी किसी जाति के साथ इनका भारी उपकार किया था। सस्त्र नहीं है। ये लोग ४ सम्प्रदायमें विभक्त हैं,-मिडल-पहाड़ी असभ्य जातिविशेष । चोरी डकैती दुमरालो, चिन्त, रक्ष और अमरी। ये लोग सगोलमें करके ही पे अपना जीवन निर्वाह करते हैं। झालयान- विवाह नहीं करते । पहाड़ी खेतों में रुई और धान की खेती के दक्षिण योजदारसे ले कर बेला तक इनका वास देखा कर अपना.गुजारा चलाते हैं। जाता है। इनमें दो विभाग हैं, माहिजाई और फैलवान ये लोग गी आदिको नहीं पालते और तो क्या, अप-जाई। अलावा इसके इनमें विजंजु नामक एक और श्रेणी वित्र जान कर उनका दुध तक भी स्पर्श नहीं करते। है। फिर उममें भी आमालारी और ताम्बावारी नामके सभ्यताके क्षोणालोकसे इनके कुसंस्कारका अधिकार दो थोक हैं। ये अत्यन्त दुई और लुएठन प्रिय होते फुछ कुछ दूर होता जा रहा है । अभी ये हल चलाने हैं। जिगार-मिङ्गल और रक्षणो लुस्कीमें इनका वास है। खास कर इनके कोई घर नहों, तम्बूमें हो रह कर 1. अरणेमकोठे इनका सर्वप्रधान देवता है। ये लोग! कालातिपात करते हैं। . . . . . Vol. ITII. 130