पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/६२५

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५५३ हमें अवनत मस्तकसे उनकी पूजा करनी चाहिये । जो जाते हैं-'सदा सत्यवादी मित्रके सहस्र कर्ण और सहस्र भापकी स्तुति करता है, उस पर आप सदा प्रसन्न रहते । नेत्र है। ये अपने विस्फारित नेत्रोंसे जगत्के लोगोंका है। (उन्हीं) स्तुति करने योग्य मित्रके सन्तोपके लिये यह काम देख रहे हैं और मङ्गलका विधान करते हैं।' हन्य अग्निमें डाल देना चाहिये ।५ मनुष्योंके पालन ___ उन्होंने पहले हो धुलोक (स्वर्गलोक) में वैदुर्य शैलके करनेवाले मित्र देव, अन्न और भजनाहं धन बड़ा हो । पूर्व देशको पार किया, जहां आशुगति । अत्यन्त शोध. कीर्तिमय है।६ जिस मिलने अपनी महिमासे घ लोक- गामी) घोड़ोंके साथ अमर्त्य सूर्य रहते हैं। मिथ-स्वर्णने (स्वर्ग) को वशीभूत फर रखा है, उन्होंने ही कीर्ति भूपित हो कर उस शैलके शिखरसे सारे इरानको देखा मान् हो कर पृथ्वीको खूध शस्यशालिनी बनाया है७ था। उन्हा का कृपास राज यवगे दुगाका निर्माण करते जो लोग शत्र जीतने में सक्षम (इन) बलवान् । है। उन्हीं के प्रभावसे वहु क्षेत्र-मण्डित सारे शैलों पर मित्रको हव्य देते थे मानो सब देवताओंको धारण करते जीपोंका आहार उत्पन्न होता है। उन्हीं के कारणोंसे हैं। देव गौर मनुष्यों में जो यहि अर्पण किया करते हैं, गंभीर कूपमे अधिक जल रहता है और उन्हीं को कृपासे उनको मित्र कल्याणकर अन्न दिया करते हैं। नाये चलानेवाली स्रोतस्विनियां ऐस्कत, पौरुत् मरु, किन्तु मनुस हितामें क्या लिखा है, सुनिपे,-- हरोयु ( सरयू ), गोमुग्ध और काईरिजेम प्रवाहित हो "मनसीन्दु' दिशः श्रोत्र क्रान्ते विष्णु वले हर।। रहो है। ये सप्तलोकमें प्रकाश दिया करते हैं। जो पाच्यमि मित्रमुत्सर्गे प्रजने च प्रजापतिम् ॥" (१२।१२१) जनेच प्रजापतिम" (२२२१२याग यज्ञमें उपयुक्त स्तोत्रोंसे उनकी पूजा करते हैं उनके मनमें चन्द, कर्णमें दिक्. याताके समय विष्णु, वल. कानों में जयध्वनि निनादित हो रही है। में हर, यातमें अग्नि, मलमें मित्र और उत्पादन काल- मिहिर पपतमें मित्रको वनधर, अमिनधुक और में प्रजापतिका नाम लिया करना चाहिये । यहां अहुरमजदसे ऊंचा स्थान दिया गया है। फिर अवस्ता मनुसंहिताकारके हाथ मिलदेवकी अवस्था शोचनीय हो। के यश्नमे अरमजद हो सर्वप्रधान सृष्टिकर्ताक रूपमें वर्णित है। गई है। उनका एक समय अत्यन्त ऊचा आसन था ।। अवश्य ही उनको कोई परित्याग कर न सका। वेदमें | ___'अहुरमजद स्तितम जरथुस्त्रको कहते हैं, जद मैंने सूर्य और मित्र भिन्न भिन्न देवता है किन्तु पौराणिक ! विस्तृत क्षेत्रके अधिपति मिथकी सृष्टि की, तब मैंने युगमें मित्र और सूर्य एफमें मिल गये हैं। अपनी तरह हो उसको भी याग और प्रजाके उपयुक्त सूर्य शब्दमें विस्तृत विवरण देखो। वना कर सृष्टि की थी।" मित्र केवल वैदिक ऋषियोंके ही उपास्यदेयता नहीं वग्न ____ पाश्चात्य पण्डितोंके मतसे वेदमें जिस तरह मिला- एक दिन सारे सम्म जगत्के आर्यो के उपास्यदेवता थे। वरुण हैं, अयस्तामें उसी तरह मिथ और अहुरमजद हैं। पारसियोंके प्राचीन अवस्ताशास्त्र में यह मित्रदेव 'मिथ' नामसे और इसके वादके पलयीशास्त्र में 'मिहिर' ___प्राचीन इरानमें सर्वत्र इन्हीं मिथको उपासना प्रच. नामसे विख्यात हैं। ऋग्वेदमें जैसी मित्रकी स्तुति है, लित थी। इन मिनरूप सौरज्योतिकी उपासनाका अवस्ताशास्त्र के मिहिरवपतमें भी 'मिथ' देवको चैसी ही शाकद्वीपमें भी प्रचार था | जरथुस्रके अहुरमजदुको सर्व- स्तुति दिखाई देती है। इस मिहिरपयतके आरम्भमें हो लिखा है- शक्तिमान और सर्वप्रधान कह कर प्रचार करनेसे मित्रके "यहां आओ, हम लोगोंको साहाय्य करो। हम लोगों पूजनेवाले दो भागोंमें विभक्त हो गये। जरथुस्तके मताव- के सामने आओ और सुप्ती करों। अन, अजेय. पूज्य, लम्बियोंने अहुरमजदको सर्वशक्तिमान् और सर्व: प्रशस्य और अमित्रघ्रक मित्र विस्तीर्ण क्षेत्रोंके शास- 1. प्रधान तथा मिथको अपना आदि और पविततम यिता है।" विकाश खोकार किया। किन्तु घे दिन, और रातके इसके बाद जगह जगह पर इस तरहक मन्त्र पाये' अधिदेवता थे। दूसरा दल अहुरमजदकी श्रेष्ठताको Tol. IVIL. 189 ___वरुण देखो।