पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/६३

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मदतत्त्व-पहचर नहीं थी और न उसका परिच्छेद हो था। इसलिये। सांख्यका आतत्त्व है । यह अदंपत्ति जिससे या यह अवच्छिन्न थी। पीछे प्रतिसे जितने मोटे पतले जिमके परिणामसे उदय होता है यही मदतस्य विकार उत्पन्न हुए उतनी ही यह विषयपरिच्छिन्न कहलाता है। यह अदतत्त्व प्रत्येक भात्मा मौजूद है। और मलिन होती गई। प्रकृतिका प्रथम विफार या, यह पद एक गणनामें व्यष्टि और समस्त गणनामें प्रथम स्फूति ही जगद्वीज या महान है। इसका सांकेतिक समष्टि है। यह, अभिमान और महतत्व समी एक नाम महत्तस्य है। सृष्टिको प्रारम्म और महत्तत्यकी है। केवल नाममें फर्क है। उत्पत्ति दोनों समान हैं। शय नहीं होनेसे शानका महतव यार अह'तत्त्वमें प्रभेद यह, किमदत्तत्य. आविमीय होना ही महत्तत्वका दूसरा लक्षण है। झयके का मैं भलथ्योत्पन्न और भदंतरचका मैं लक्ष्योत्पन्न है। नहीं रहनेसे शानका विकाश होना, यद्द विपय किस पहले कद आये हैं, कि प्रकृतिका प्रथम परिणाम महत्तस्य प्रकार अनुमय करना होगा, महर्षि मनुने उसे अच्छी है। महत्तत्त्वसे महतत्त्व तथा महतत्त्वसे एकादश तरह समझा दिया है। यथा- इन्द्रियां और पञ्चतन्मात्रको उत्पत्ति हुई है। प्रति. "आमीदिदं तमोभूतमप्रसातमतक्षयाम् । फे ऐसे विरूप परिणामस ही जगतकी सृष्टि होती , भातकर्यमविशय प्रभुप्तमिव सर्वतः ॥ है। जब दूसरी वार प्रतिका स्वरूपपरिणाम उपस्थित . ततः स्वयम्भूर्भगवान व्यको व्यर्याननदम् । । होता है, तब जगत्का लय होता है। तत्व जिस प्रकार . .. महाभूतादिवृत्तीजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः ॥" प्रादुर्भूत होता है, लय होने के समय भी उसी प्रकार लोन (मनु । भ.) या करता है। पफादश इन्द्रिय और पञ्चतन्मान अह- .. “यार जगत् प्रकृतिलोन था। प्रतिलीन रहना ही तत्त्वमें, मह महत्तस्य तथा सबसे अन्तमें महत् महति. लय और प्रलय है। यह अवस्था आशात, अलक्ष्य और ) में लीन होता है। (सम्म्मिद०) अप्रतपर्य यो अर्थात् उस समय प्रत्यक्ष, अनुमान और विष्णुपुराणमें लिखा है-प्रलयकालमै गुणसाम्य शम्द पे सय प्रमाण नहीं थे तथा प्रमाणका विषय प्रमेय । अर्थात् सत्त्व, रज और तमोगुणको निम्पिार भयरथा पदार्थ भी नहीं था। पद भयस्था प्रायः महासुपुप्तिके होती है। पीछे जय मुष्टिकाल उपस्थित होता है, तथ सदृश थी। परमेश्वर अपने इच्छानुसार परिणामी और अपरिणामी , जिस प्रकार हम लोगोंको गाढ़ी नींद टूटने पर प्रगति और पुरपमें प्रविष्ट हो कर उन्हें शोभित अधांत मात्र खुलते न खुलते अशान दूर हो जाता और शान- सृष्टि करने में उन्मुप करते हैं। इसके बाद पुरराधिष्ठित का उदय होता है, उसी प्रकार नितान्त दुर्लक्ष्य प्रलय गुणसाम्यसै गुणप्यान अर्थात् महसत्य उत्पन्न हुमा । रूप जगत्को निद्रा भङ्ग होने पर प्रतिगर्भमें सूक्ष्म । यह महतत्त्य दोन प्रकारका है, सास्थिक, रामस और जगत्फे अभिव्यक ( अपुर स्वरूप) अन्धकारको नष्ट तामस । चीज जिस प्रकार त्या दारा आहत है उसी फरयाले सटिकता भगवान् स्वयम्प्रभ हिरण्यगर्भ पा प्रकार पोंक गुणसाम्य (प्रधान सरय) से पद मद. महत्तत्त्यका आविर्माय हुआ था। ज्यों दो जगत्को निद्रा | सत्य भावृत है अर्थात् प्रधानतत्त्व महत्त्वका प्यापक भादुई त्यो हो महान् विकाश उदय हुमा, सूहा जगत् । है। पीछे महसत्रवसे अदतत्यको उत्पत्ति मौर. प्रमशः उसके शरीर में मङ्कित हो गया। मनुको . इस उक्तिसे इसी प्रकार राष्टिं दुमा करती है। ( विराष०१२ म.) २ कुछ तान्त्रिकोंके भनुसार संसारपे. सात सत्त्याम मदत्तस्यका थोपा बहुत भाय समझ पाता है। महत्तत्व, सं सबसे अधिक सूक्ष्म तस्य । ३जीपारमा । हिरण्यगर्भ और ग्रह पे सभी समान है। . महत्तम (सं० लि.) सबसे अधिक बड़ा या श्रेष्ठ।

. महसत्यसे अदतरयको उत्पत्ति हुई है। पूर्वोक्त प्रथम महत्तर (सं०१०मी०) मयमनपोरसिंगपेन महान महान

परिणामक अर्थात् में है। इत्यादि माजात नित्यया- नरए । पद। २ सम्मानार्दै उपापिपिरो (नि.) मिफा वृत्ति एक देशमें जो 'मदत्ति' संलग्न है, यही ३ मतिमय मदत दी पदार्थो मसे बढ़ाया धेठ। -