पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/६४३

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मिरखम्भ-पिराज ५७५ मिरसम्म (सं० पु. ) मिरखम देखो। मिरफ (सं० लो०) वौद्धमतसे एक बहुत बडी संख्याका मिरहम (हिं० पु०) कोल्हमें वह लकड़ी जो बैठ कर ' नाम । होकनेको जगह खड़े बलमें लगी रहती है। मिरा (सं० स्त्री०) १ मूर्वा। २ मदिरा, शराय । मिरगचिड़ा (हिं० पु०) एक प्रकारका छोटा पक्षी। । मिराज (बड़ा)-वम्यई प्रसिडेन्सीके दक्षिण महाराष्ट्र प्रदेश मिरगिया (हिं० पु.) यह जिसे मिरगोका रोग हो। के पोलिटिकल एजेन्सीके अधीन एक सामन्त राज्य । मिरगी (हिं० स्त्रो०) मृगी देखो। इसका क्षेत्रफल ३४० वर्गमील है। यह प्रधानतः ३ मिरचा (हिं० पु०) लाल मिच। खएडोंमें विभाजित हुभा है, १ कृष्णनदीका उपत्यकांश, मिरचाई (हिं० स्त्री०) १ मरिच देखो । २ काला दाना देखो।। २ धारया जिलेका दक्षिण विभाग और ३ शोलापुर मिरचियागंध (हि. पु०) रूसा घास । जिलेके अन्तर्गत प्रदेश। मिरवा (हिं० स्रो०) छोटी पर बहुत तेज लाल मिर्च।, इस राज्यका कृष्णनदीके किनारेका प्रदेश यहुत ही 'मिरजई (फा० स्रो०) एक प्रकारका बंददार अंगा जो कमर। उर्वर और समतल है। सिया इसके अन्य स्थान पार्यत्य तक और प्रायः पूरी वाहका होता है। । और वन्यभूमिसे परिपूर्ण हैं। बीच वोचमें गएडशैल- मिरज़ा (फा० पु०) १ मोर या अमोरका लड़का, सोर माला भी दिखाई देती है। इसको मिट्टी काली तथा जाय। २ राजकुमार, कुचर। ३ तैमूरवंशके शाह- ' कपास उत्पन्न करनेके लिये परम उपयोगी है। यहां 'जादोंकी उपाधि । ४ मुगलों को एक उपाधि । ( वि०) ५, जलका अभाव भी नहीं। नहर, फुए, तालाव आदि कोमल, नाजुक। जलाशय यहांके जलकप्टको भगाये रहते हैं। दाक्षिणात्य- मिरजाई (फा० स्त्री० ) १ मिरजाका भाव या पद। २ के अन्यान्य स्थानोंकी अपेक्षा यह स्थान अपेक्षाकृत सूत्र अभिमान, घमण्ड । २ सरदारी, नेतृत्व । ४ मिरजां देखो।' जाता है। प्रीष्म ऋतुमे यहाँकी धप सही नहीं जाती। मिरजान (फा० पु० ) प्रवाल मूंगा। महाराष्ट्रफे पेशवाने वहांके पटवद्ध नवंशको यह स्थान मिरजामिजाज फा० वि०) नाजुक दिमागका । जागीरमें दिया था। सन् १८२० ई०में सरकारने उक्त मिरदंग (हिं० पु० ) मदन देखो। पटवद्धन-वंशका अधिकार स्वीकार कर इसको चार मिरदंगी (हिं० पु०) वह जो मृदंग बजाता हो, पखायजी। भागोमें वांट दिया है। इनमें प्रत्येकने स्वीकार किया है मिरन --अफगानी सीमाके निकटकी कोहार उपत्यका- ' कि ये घुड़सवार सैनिक दिया करेंगे। को एक अंश । कोहाटको पार कर १० कोसमें फैली सन् १८४२ और १८४५ ई०में क्रमसे पुनाभाववश हङ्गार उपत्यकामे जाना होता है । इसके बाद ही मिरनजे., इसके दो भागों पर अगरेजोंने अधिकार कर लिया । याकी का समतल क्षेत्र दिखाई देता है। इसका क्षेत्रफल वर्ग-' दो बड़े मिराजके सरदार गङ्गाधरराव गणपत जातिक ,मोल है । इसके दक्षिण-पश्चिम भोर कुरम नदी बहती है। ब्राह्मण हैं। यह इन्दोरफे राजकुमार कालेजमें विद्याभ्यास यहाँ दुर्गादि द्वारा सुरक्षित सात प्राम है। यहाँके अधिः ' करते थे। दक्षिण महाराष्ट्र प्रदेशमें ये हो सर्वश्रेष्ठ सर- , यासी अफगानी हैं। इनमें जिल्लोस्त अफगान संख्यामें दार समझ जाते हैं। उन्हें हत्याकं अपराधीको दण्ड- कम होने पर भी विशेष वीर्यशाली और युद्धिमान हैं। विधान करनेमें पोलिटिकल पजेएरसे राय लेनी नहीं - इनमें घुड़सवार सेनादल भी हैं। पश्चिम मिरनजैसे पड़ती। सरदार-वंशमें दत्तक । गोद) लेनेका अधिकार पवार कोथूल. पर्वतमाला तक इनकी यस्ती दिखाई ! है। ज्येष्ठ पुत्र राज्यासन पर बैठ कर शासन करते हैं। देती है। यहांका मिराज और लक्ष्मीश्वर नगर समृद्धिशाली है। • काबुलको यात्रा करते समय अङ्करेज-सेनापति लाई | मिराज (छोटा)-दक्षिण महाराष्ट्र देशका दूसरा सामन्त रावटसने इसी स्थानसे भारतीय सैन्यकी परिचालना राज्य । धारवाड़ जिलेके बकापुर उपविभागफे, सतारा की थी। जिलेके तासगांव, उपविभागके, और गोलापुर जिलेके