पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/६५९

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-मिल ५६६ 'पुरारकारके प्रवल यन करने पर भियग्यमें दूर होगा। तरह समझमें आ जाता है। यूरोपका दर्शनशास्त्र दो किन्तु उसमें समय लगेगा । मानयसुखकी बाधाओंके भागोंमे विभक्त हुआ है। १ला श्रौत या आप्तवाद • साथ मम्मुख संग्राम करने में मनुष्यको कई पीढ़ियां बीत' (Intuitive ), २रा प्रमाण और प्रत्यक्ष वाद (Empi. 'जायेगी। किन्तु अन्तमें जय सुनिश्चित है। फिर भी rical)। १ला पक्ष विवेकके प्रकाशमें कर्तव्यका पथ जिनको यदि परिमार्जित है और हय परार्थपरतासे निर्धारित करनेको कहता है । २रा पक्ष परीक्षा और - युक्तिके प्रकाशमें गन्तव्यपथका अवधारण करता है। उद्दीपित है, उन सब चिन्तागोल मानवहितैषी दार्शनिक "। जर्मन दार्शनिकों के मतका अनुसरण कर हेमिल्टनने 'योद्धाओंको मन सदा प्रफुल्लित रहेगा। उक्त सुखके साथ ले पक्षक ( Intuitive ) अनुकूलमें युक्ति दिखलाई स्यार्थसिद्धिसम्भूत किमी भो सुग्वकी तुलना नहीं हो' थी। अतपय प्रमाणवादी मिल उसके सिलसिलेवार सकती। ज्ञानके विमलप्रकाशमें उद्भामिन फिर भी अतुन समालोचना किये बिना न रह सके । हेमिल्टनके चित्त मक्रेटिसके संशगाधिन आनन्द विष्ठाभोजी शूकर- शिष्योंने मिलके मतका प्रतिवाद किया था। इस तरह की तृप्तिसे भी सहन गुण बढ़ कर है। सांख्यदर्शनके । रचयिता भगवान् कपिलको तरह महात्मा मिल जगत्के । ही दार्शनिकयुद्धमे अगरेजोके दर्शन परिपुष्ट हो गये थे। मानन्दको अनन्तता और आतिशय्य असम्भव समझते इसके बाद मिलने अगष्टम् कोमतके दार्शनिक मतको समालोचना की। यथार्थमें मिल और कोमते इन दो थे। किन्तु उन्होंने मुक्तकण्ठसे स्वीकार किया है, कि । मनस्थियोंने ही थी शताब्दी में चिन्ताराज्यमें युगान्ता. विविध दुःखको अत्यन्त निगृत्ति पुरुषार्थ है और अवि- उपस्थित किया था। उसी चिन्ताके सोतने यूरोपको मिश्र अनन्त सुग्वकी सम्भावना होने पर भी शान्ति और पार कर हिन्दुस्तानके मानसराज्यमें बहुत अधिकार जमा चित्तप्रसाद मानवमानका अधिगम्य है। ये उसके लिये लिया था। जो अनुप्ठेय मुष्टियोगकी व्यवस्था कर गये हैं, ये नीचे मिलके सम्यन्धमै यह वक्तव्य है कि उनका दार्शनिक मत अधिक तमोगुणी है और कोमतेका मत रजोगुणो। (१) जीवन में जो सम्भव है, उससे अधिककी भाशा दर्शन. विमान धर्मनीति । दर्शन, विज्ञान, धर्मनीति, राजनीति, समाजतत्त्व आदि म करना । (२) विद्यानुशीलनमें अनुरक्ति । (३) मानवीय शास्त्रोंके फुसंस्कारोंको नष्ट कर पृथ्वोमें सुख- सहृदयता या हृदफा अकृत्रिम प्रेम । भक्ति और स्नेह- मय आदर्शराज्यको स्थापना करना हो मिलका उद्देश्य १ का संस्थापन करना । (४) मनुष्य प्रेम या सर्वसाधारण और नये कल्पित राज्यको सृष्टि करना कोमनेका उद्देश्य की पाल्याणचिन्तासे आनन्दातिशय्य अनुभव करना । था। व्यक्तिगत स्वाधीनता पर समाजको शृङ्खला सौंप यही मिलको धर्म नोतिका मूलसूत्र है। किन्तु परिणत देनेसे जगत्को उन्नतिको गति बन्द हो जाती है, यह मिल. ययसमें सामाजिक संसर्ग के लिये उन्होंने अनुकूल मत का उद्देश्य था ।मल ईश्वर में अविश्वास नहीं करते थे। • प्रकट किया है। उन्होंने कहा है,-"जो स्वेच्छापूर्वक सांसारिक दुःखोंकी । . 'मिलको लिखी पुस्तौकी समालोचना इस छोटेसे सृष्टि कर मानवसमाजको अहर्निश दग्ध कर रहे हैं, धे लेखमें करना असम्भव है। हम मिलके दार्शनिक मत कभो सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं कह जा सकते।" उनका भौर १५यीं शताब्दीमें उनको उपयोगिताके सम्बन्ध मत कपिलके 'ईश्वरासिद्ध' मतका पोषक है । अर्थात् दो पफ याप्त कह कर इस लेखको अन्त करेंगे। सन् प्रमाण द्वारा ईश्वरका अस्तित्व कायम नहीं किया जा १८५१ ई० में हमिल्टनका दर्शन प्रकाशित हुआ। मिलने सकता। अनवस्था दोष परिहारके लिये उन्होंने कहीं ८वर्णके बाद सन् १८५६ में इस दर्शनकी विस्तृत | फहीं सृष्टिके प्रवाहक अनादि कहा है। मिलको प्रन्या. समालोचना का भार हामल्टमका भारत दिखला कर चलो पढ़नेसे यह स्पष्ट मालूम होता है, कि उन्होंने एक प्रकाएड प्रस्ताव प्रकाशित किया। इस पुस्तकमें मानववात्सल्यताको साधु प्रेरणासे प्रेरित हो कर उनका प्रगाढ़ चिन्ताशीलसा और दर्शन-मत भच्छी । लेखनी हाथमें लो थी। Vol, I . 148