पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/६९३

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मिसः योद्धा रथारूढ़ हो धनुपवाण ले कर-युद्ध करता या11 जाता-था, वह कम, जातिभेद और पुरुषानुकमसे किया पैदल नाना- तरहके अस्त्र शस्त्रोंसे सजित हो कर युद्ध | जाता था। दरिद्र प्रजा अपने दुःखों को राजाफे समीप करते थे। इनमें धनुषवाण और तलवार, भाला, परछा | कह सकती थी। वैदेशिकोंके प्रति विजातीय घृणा और कुठार आदि प्रधान अस्त्र थे। शिकारमें सूक्ष्मान- इनकी कम न थी। शिल्प-व्यवसायो उच्चवर्णका आदर आग्नेय शिलाखण्डका व्यवहार होता था। सेनाये | नहीं पाते.थे। और तो क्या, बढ़ई और चित्रकार भी युद्धक्षेत्र में नाना तरहके न्यूहाकारमें सुसजित होती थीं। निम्न श्रेणी में गिने जाते थे। बड़े आदमी श्रमसाध्य - रीति-नीति । कार्योंसे घृणा करते थे। पुरोहित-सम्प्रदाय वर्णगुरु उत्कीर्ण शिलालेखों और प्राचीन पत्रों ( Hiera-1 थे। वे यजन, याजन, अध्ययन और अध्यापन tic papyri ) प्राचीन मिस्रवासियोंका गार्हस्थ्य-जीवन करते थे। स्पष्टकपसे अङ्कित है। जिस शिक्षासे पौरुप महिमाका राजकीय कर्मचारोगण उच्च पासे लिपे जाते थे। यथार्थ विकाश होता था, विद्यालयों में उसी तरहकी विज्ञानविदोंकी उच्च श्रेणी में गिनती होती यो । सेवक- शिक्षा दी जाती थीं। जो परीक्षा उत्तीर्ण होते थे, सम्प्रदाय श्रमजीवियोंसे अधिक आदर पाते थे। युद्धमें ये राज्यके उच्च पदों पर प्रतिष्ठित किये जाते थे। पाल्य पकड़े गये फैही गुलाम बनाये जाते थे। कालमें सुनी प्रथा प्रचलित थी। किन्तु यह धर्मका अनु शैलमय स्मृति-स्तम्भके गात्रमें मिस्रो गार्हस्थ्य छान नहीं समझी जाती थी, त्रियों का प्राधान्य था। ये जोवनका उज्ज्वल चित्र अडित है। धनाढा व्यक्ति प्रायः याजक और पुरोहितोंके आसन पर बैठ सकती थीं और विलास सागरमें निमग्न रहते थे। किन्तु ये भोज- पुरुषोंके समानाधिकारको प्राप्त हो कर सांसारिक | समारम्भ बड़े उत्सबके साथ करते थे। गृहस्थ - जीवनके बहुतसे कामों में भाग लेतो थी । पुरुष एक पत्नी और गृहिणी एकासन पर धैठ सकती थी। सव निम- रखते थे। स्त्री ही घरकी मालकिन रहती थी। उस वित व्यक्ति अपनी स्त्रियों के साथ भोज-समारम्भमें समय भी उपपति और उपपलोका व्यवहार जारी था। । उपस्थित होते थे। दम्पतीके लिये एकत्र दो कुर्सियो . ७००० वर्ष पहले वर्तमान सभ्य समाजकी तरह : (chair ) और अविवाहित पुरुषोंके लिये एक एक मिसमें स्त्री-स्वाधीनता थो। जातिभेद भी कुछ कुछ था। आसन रखा जाता था । सम्भ्रान्त व्यक्ति या भले आदमी हो। हिरोदोतस, दिउदोरास और प्लेटोके मतसे जातिभेदः कुर्सियों पर और साधारण व्यक्ति फर्श पर बैठते थे। प्रवलित था। गुण-कर्म-विभागके अनुसार सात जातियों- ' प्रत्येक निमन्त्रित व्यक्ति और अभ्यागतके उपस्थित की सृष्टि हुई थी। पीछे पे पांच जातियां रह गई, होते ही गृहस्वामोके सेवक उनके गलेमें पुष्पहार पह- पौरोहित्य, योद्धा, कृपक, शिल्पी और पशुपालक या नाते थे और कस्तूरीमिश्रित पफ पद्मपुष्प उनके सेयक। भारतीय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, इन मस्तक या हस्तमें अर्पण करते थे। इसके बाद चारों चार यों के अनुसरणसे ही सम्भवतः उनकी जातियां , ओर रखी कुर्सियोंके बीच मेज पर भोजन-सामग्री रख कायम हुई थी, एफ जाति के साथ दूसरी जातिका विवाह, उनको ला कर यहां बैठाते और भोजन करनेका निवेदन होता न था। पुन पिताके दिखाये हुए पथका अनुसरण करते थे। फल, मिष्टान्न, मांस, मध, मछली आदि किया करता था। पौरोहित्य या ब्राह्मण-शास्त्रको अन्यान्य भोज्य सामग्रोको ढेर लगा दी जाती थी। सृष्टि करते थे। पुरोहित विचारकके पद पर भी नियुक्त गिलासमें मद्य ढाल कर रख दिया जाता था। भोजक किये जाते थे। पहले मधुरभापिणो सौन्दर्यशालिनी युवती नर्तकियां राजाओंके यहां पटरानियोंके सिया. विलासिनी विविधरूपसे. नाच गान कर अभ्यागत व्यक्तियोंका त्रियोंका अमाय न रहता था। परिवारफे सभी व्यक्ति मनोरजन किया करती थी . -एकानभोजी थे। जीविकार्जनके लिये जो काम किया। नृत्य गीत आमोदफा पक प्रधान अङ्ग समझा जाता Vol. XVII. 164