पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/६९५

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मित्र । हैं। मात्माका विनाश नहीं है। फिर कर्मफलका भी। मृत्युके बाद आत्मा इसी रूपमें उड़ कर ओसिरिसके श्रय नहीं होता। इसी कारणसे वार वार जन्म-ग्रहण, यहां जाती है। मिस्रके धर्मशास्त्रमें लिया है, कि मान- करना पड़ता है। जो संसारमें पुण्यकर्म करते है, यात्मा बहुत दिनों तक स्या या नरकका परिभ्रमण कर मोसिरिसके विचारफलसे यह स्वर्ग जाते हैं। जो | जब अपने पहले शरीरने आयेगी, तब उसकी सुरक्षित पापाचरण करते हैं, ये अनन्त नरककी यन्त्रणाके अधि । मृतदे हमें (Embalmed mutims ) नये जीवनका कारी होते है। भोसिरिसके विचारसे कोई बच नहीं! सञ्चार होगा। और मनुष्य उस समयसे अनन्त सकता। सभोको अपने किपे काँका फल भोगना जीवन लाभ कर सकेगा। उस चिरस्थायी सम्पाटको पड़ता है। किन्तु पिस-धर्मशास्त्रके अनुसार जीव तुलनामें क्षणभंगुर मनुष्यजीवन अति अकि- की मुक्तिका उपाय अभी तक थाथि कार ही नहीं हुआ चित्कर है। इसीसे राजे महाराजे करोड़ों रुपये खर्च है। उन्होंने और भी कहा है, कि जो जैसा पुण्य और कर ऐहिक भवनोंको अपेक्षा पारलौकिक भवनों का निर्माण जैसी कामना करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। | करते थे। क्योंकि, शरीर नष्ट होनेसे आत्माका वास- पुण्यके कर्मानुसार कोई चन्द्रलोक और कोई सूर्यलोक । स्थान सदाके लिये विनष्ट हो जायेगा। आत्मा निरय. ' जाता है। देवगण स्वर्गसे पुष्पकरण द्वारा आते जाते हैं। लम्य हो कर इधर उधर भागी फिरेगी। इसीलिये सुन्दर यह पुष्पक रथ एक तरहकी नायकी तरह है जिसे | भवन बना कर मतदको उममें जमा भवन बना कर मृतदहको उसमें रष सुरक्षित रखते हम लोग ध्योमयान कह सकते हैं। थे। प्रति वर्ष फविस्तान पर जा पर सुगन्धित द्रोसे फालयामसे विविध संस्कार और पुरोहितोंके लोभ- श्राद्ध-तर्पण किया करते थे। एक एक समाधि-मन्दिर • के कारण विविध प्रकारको काल्पनिक प्रथाकी सृष्टि हुई। लिये एक एक पुरोहित रहता था। शयद हमें मोम, एक पुरोहितोंने अन्त में विधिविधान किया, कि जिसकी शव-/ तरहकी दवा और अन्य चीजोंको लेप कर उसे सुरक्षित देह प्रस्तरमय शयाधारमे गाड़ी जायेगी, स्वर्गम उसकी किया जाता था। शवकी नाड़ियां अन्य पात्र में सुरक्षित रखी प्रेतात्माको सुरम्य सोध रहने के लिये मिलेगा और मृत- जाती थीं। यह पान चार दानबियों के मुखको तरह होता देह पर कुछ मन्त्रपाठ करनेसे आत्मा सर्वपापसे मुक्त हो। था। उक्त दानवी उसको गनपूर्वक रक्षा करती थीं। पिछले • कर स्वर्गकी सीढ़ियों पर चढ़ेगी। कभी कभी पुरोहित समयमें समाधि-भवनमें नाना प्रकारके खाद्य द्रश्य भी मृतदेह पर कवच आदिका भी प्रयोग करते थे। मृतदेह । रग्वे जाते थे। बहुमूल्य होरे और नाना अलङ्कारोंसे में कयन आदि बांध देनेने उसको आत्माके निकट यमः | शवदह भूपित होती थी। राजफे दूत नहीं जा सकते। इसी विश्वास पर निर्भर यह प्रथा उस समय ऐसी प्रबल हो उठी थी, कि फर राजा महाराजाओंने करोड़ों रुपये खर्च कर समाधि- दरिद्र भो पिता माताका समाधि मन्दिर निर्माण करने में क्षेत्र या मकवरे बनवाये थे। १ और २०३ राज । अपना सर्वस्व लुटा देने में कुण्ठिन नहीं होता था। वंशीय राजाओं का समाप्रिक्षेत्र जिस तरह शिल्पनैपुण्य धर्मशास्त्र के संस्कारों में श्राद्धका संस्कार हो सबसे और निर्माण परिपाटोसे चित्रित किया गया है, यह । प्रधान था। प्रत्येक व्यक्तिका आजीवन परिश्रम इसी में इस समय विस्मय उत्पादन कर रहा है। खर्च हो जाता था । शास्त्रानुमोदित अन्य किसी संस्कार. - इस प्रकारके चिरस्थायो समाधि मन्दिर बनानेकी का पता नहीं लगता। किसी प्रस्तरस्तम्भ या शिला. प्रथामें मिस्त्रवासियों के दो तरहफे धर्मविश्वास देवे जाते। लेखमे विवाह-संस्कारका कुछ भी उल्लेख नहीं भौर न हैं, आत्माको अमरता और मृतदेहफा पुनरस्थान इसके लिये कोई नियम ही प्रचलित था। भाई बहनका ( Resurrection of the tlesh)| समाधि मन्दिरमें विवाह होता था। चत्रा भतीजोय साथ भो गिवाह मानवास्माको चित्र अडिन रहता है। इसका मुख मनुष्य कर सकते थे । अतएव विवाह के सम्बन्धमे कुछ की तरह और शरीर श्येन पक्षोकी तरह पक्षविशिष्ट है ।। भो नियम दृष्टिगोचर नहीं होता। दोनोंको सम्मति Htte.