पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७११

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मोना ६३७ शिल्पका काम बड़ो निपुणताके साथ होता है। इनमें | लगा था। इसको देख कर सर जार्ज वाउडने कहा -दिल्लीका शिल्प कुछ कुछ जयपुरको घरावरी फर था, कि यह भारतीय मीना शिल्पका अद्वितीय स्मृति- सकता है। स्तम्म है। कहा गया है, कि इस मोनाशिल्पको मानसिंह घवलपुरमें बड़ी बड़ी वस्तुओ में मोनाका काम होता | लाहोरसे जयपुर में लाये थे। जयपुरमें जो सब भुवनविष्यात है। कहा गया है, 'कि ४०० वर्ष पहले सुलू नामके एक | शिल्पी उत्पन्न हुए थे, उनमें कुछ के नाम इस तरह हैं:- मनुष्यने इस मीना-शिल्पका आविष्कार किया था। उस | हरिसिंह, अमरसिंह, कृष्णसिंह आदि। इनमे हरिसिंह समयसे इसको बड़ी उन्नप्ति हुई है। और कृष्णसिंह समधिक प्रसिद्ध है। 1 • बङ्गालमें किसी गहनेमें मोना लगानेमें एक रुपये काश्मीरमें भी भोनाकै कामको बड़ी उन्नति हुई है। भरोसे लगायत २ रुपये भरी सक खर्च पड़ जाता है। भारतवर्ष के अनेक स्थलों में काश्मीरके मोनाशिल्पकी योधपुरमें 'हिमनिया' नामका एक सोनेका गहना चीजें विकती हैं। काश्मीरका मीना प्रायः नीले रंगका तैयार होता है। यह कण्ठ के रूपमें पहना जाता है। होता है। यहां तरह तरहके लोटे, गिलास, डमरू मादि 'यह गहना भारतीय और औपनिधेशिक प्रदर्शिनियों में वाजे और विविध अलंकारों पर मानाका काम होता है। विशेष प्रशंसित हुआ था। इसका मूल्य २०) से २००)। कश्मीरी शालकी वारीक दस्तकारीमै मोनाशिल्पका रुपया तक है । मारयायको हिन्दू स्त्रियां इसका नैपुण्य भी दिखाई देता है । मोनाके कामका वरतन बजन- आनन्दके साथ व्यवहार करती हैं। वाकानेर में भी मीना के हिसावसे विकता है। चांदोका मोना सवा रुपये भरी शिल्पका प्रचलन है। मीना लगानेमें ३) रुपये भरी मज. और तांयेका मीना ढाई आनसे चार आने तक दूरी पह जाती है। आमामके अन्तर्गत जोडहाट प्रान्तमें | विकता है। स्वर्ण मोनाका प्रचार है। किन्तु विक्रो अधिक न रहनेके दिलीफे मीनाके शिल्पमें पानदान और हुक्के यहत कारण फ्रमशः इसका हास हो रहा है। इन्दौर में भी विख्यात हैं । झा, मुलतानका गिलास मशहर है। जयपुर- " मीनाका.काम होता है। । की शिल्पप्रदर्शनोके समय बहबलपुरसे मोना शिल्पका ६वीं शताब्दी में जयपुर में मीनाशिल्पकी अत्यन्त | एक बोतल गिलास और शिशियां भेजो गई थी। इनका • उन्नति हुई थी। मुगल सम्राट अकबरके दरबारमे मान.: शिल्प वड़ा हो मनोहर था। इनमें प्रत्येक यथाक्रम ८५), सिंहके मोनाशिल्पकी एक छड़ी थी। यह अकवर ८७) और १७) को विका था। सिंहासनके समीप रखी रहती थी । मानसिंह यह छड़ो | कलकत्तेको अन्तर्जातीय महाप्रदर्शनीमें लखनऊसे ले कर अंकवर दरवार में जाया करते थे।५ इन्च लम्बी एक हुका मोनाका काम किया हुआ आया था। इस पर इस छड़ीमें ३३ स्वर्ण-मण्डित तायेकी चुङ्गो लगाई गई ! जैसा कारुकार्य स्थचित हुआ था, उमको प्रशंसा किये. थी। इसके बीच बीच में रंग बिरंगे स्वर्णके साथ होरेकी विना नहीं रहा जाता । राजपूताने प्रतापगढ़ में एक जहाई हुई थी। इसमें मोनाके कामका शिल्प-नैपुण्य देख कर तरहके नकली नीले मीनाका काम होता है। यह इस अवाक रह जाना पड़ता था। इसके किसी किसी स्थानमें । तरह छिपा कर तैयार किया जाता है, कि शिल्पियोंके 'मोनाके कामम हरी हरी घास चरती हुई गायें दिखाई देती . कुटुम्बके सिवा और दूसरा कोई नहीं जान सकता। ये थो, किसी किसी जगह खिले हुए हरे पीले पुष्प वृक्ष अपूर्व सब शिल्पो हाथी घोड़े आदि कई तरह जाय जन्तुओं- सोमा धारण करते दिखाई देते थे। जिस शिल्पोने इसे को पौराणिक चित्रावली और नाना "तरह विचित्र तैयार किया था, इस सभ्य जगत्मै उस तरहक शिल्पी वस्तुओं पर नकली मीनाका काम करते हैं। इनकी इस अत्यन्त विरम है। इस समय भी जयपुरसे मोनाकामका गिल्पनैपुण्यकी पराकाष्ठा देख कर चमत्त होना जो पाव निस आफ घेल्सको उपहारमें दिया गया था, ' पड़ता है ! आज भी इनकी शिल्पसम्बन्धी दाने कोई नहीं घाह भी अत्यन्त उल्लेखनीय है । इसके बनाने में चार वर्ष जानता। • Fol, ITII. 160