पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७१५

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पोपांसा नामकरण। निरूपण ही वेदान्तका प्रधान उद्देश्य है । इसलिये किसी वैदिक याग-यमादि इस दर्शनके द्वारा मोमांसित हुए। दूसरी वातका आरम्भ न कर सूत्रकारने 'ब्रह्मजिज्ञासा' ' हैं, इसलिये इसका नाम मीमांसादर्शन है। विना प्रयो-! यही लिखा है। सांख्यदर्शनमें “अथ विविधदुःखात्यन्त .'जनके कोई किसी कार्यमें नहीं लगता, धर्मनिरूपणके | निवृत्तिरत्यन्त पुरुषार्थः” यही पहला सूत्र है। विविध 'उद्देश्यले मिनिने इस दर्शनका सूत्रपात किया । इस- | दुःखोंकी अत्यन्त निवृत्तिको परमपुरुषार्थ कहते हैं। 'लिये इस दर्शनका नाम धर्ममीमांसा हुआ है। दुःख उसकी उत्पत्ति तथा निवृत्ति आदि होका - वेदके तीन फाण्ड हैं-कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड | सांख्यदर्शनमें प्रतिपादन हुआ है। दुःखनित्तिका उपाय और छानकाण्ड। इनमें जिस चेदभागको फर्मकाण्डा. निरूपण ही सांख्यदर्शनका उद्देश्य है। इसलिये इस त्मक कहते हैं उसका इस दर्शनमें विचार हुआ है, इस ) दर्शनमें पहले हो दुःव शब्दका उल्लेख आया है। इसी प्रकार लिये इस दर्शनका नाम पूर्वकाण्ड, पूर्वमीमांसा और मीमांसादर्शनका धर्मनिरूपण हो मुख्य उद्देश्य है। इस कर्ममीमांसा है। लिपे 'अथातो धर्म जिज्ञासा' इस सूत्रका भारम्भमें ही 'कर्मकाण्डात्मक वेदमें याग, दान और होम आदि समाये नाना प्रकारके कम्मौका उल्लेख रहने पर भी, यागको वर्तमान समयमें जो मीमांसादर्शन प्रचलित है वह प्रधानता तथा उस सम्बन्धके विचार इस दर्शनमें यथो- बारह अध्यायों में बंटा हुआ है। प्रथम अध्यायमें धर्म- 'चित रूपसे आलोचित हुए हैं, इसलिये यह दर्शन यक्ष-] शानका प्रयोजन, धर्मके लक्षण धर्मके प्रमाण और - विद्या या मध्यरविद्या कहलाता है। वेदविहित क्रियाकलाप इन्हें धर्म क्यों कहा जाता है, इन - दर्शनमें धर्मसम्बन्धी विचारोंका बारह अध्यायों में | सब विषयोंकी आलोचना हुई है। वर्णन है, इसलिये इसको द्वादशलक्षणी भी कहते हैं। दूसरे अध्यायमें धर्मकर्मोके अर्थान् यागयज्ञादिके वेदक मन्त्रभागको मोमांसा करना इस शास्त्रका | प्रभेद यानी अनेकत्यका निर्देश है। तीसरे अध्यायमें 'मुख्य उद्देश्य नहीं है। जहां कोई विधि निषेध नहीं | यागयज्ञादिका अङ्ग प्रधान-भावनानिणय है अर्थात् किस पाया जाता, केवल उसो स्थानमें मन्त्रका अर्थ ले कर यागका क्या अङ्ग है उसका निरूपण तथा फोन अंश मोमांसा करनेका विधान है। विशेषतः कम्मकाण्डात्मक प्रधान और कौन अंश अप्रधान उसका अवधारण है। 'बामणमागको मीमांसा करनेके लिये ही इस मीमांसा चौथे अध्यायमें याग करनेवालेका गुण तथा जिस योग, शास्रकी रचना हुई है। उपसंहारमें इतिहास देखा। जो करना पड़ता है उस विषयका निर्णय है। पांचवें प्रतिपाद्य विषय । अध्यायमें यज्ञकर्माका क्रम निर्णय और छठेमें अधिकारों का निर्वाचन है। सातवे में साधारणतया अतिदेश मिनिस्त मीमांसादर्शनमें प्रायः सभी स्थानों- वाफ्योंकी विवेचना है। आठवें में विशेषातिदेश-वाफ्यों- में धर्मतत्त्व के विचार हैं ! इससे साफ मालूम होता है की मोमांसा है। (अमुक कर्म अमुक कमके जैसा करना कि एकमाल धर्मीमांसा हो इस दर्शनका उद्देश्य और प्रतिपाय हैं। होगा ऐसे वाक्यको अतिदेश कहते हैं ) । नवें अध्याय. में ऊह विचार है। : अह शब्दका इस तरह अर्थ लगाया .., "धर्मात्य विषयं यातु मीमांसायाः प्रयोजनम् ।", जाता है,-'अपूर्वोत्प्रेक्षणमूह मन्त्रादिमें जो पदार्थ नहीं ..धर्मके लक्षण तथा प्रमाणादिका निरूपण करना ही है उसको उत्प्रेक्षा या उसके उल्लेपको ऊह कहते हैं। • मीमांसादर्शनका एकमात्र उद्देश्य है । प्रायः समी! इस अहको कैसे स्थानमे करना चाहिये, कैसे स्थानमें • स्थानोंमें जो विषय प्रतिपादित होगा पहले वही नि./ नहीं। इसका निर्णय करना ऊहके विचारका पित होता है। वेदान्नदर्शनमें 'अथातो ब्रह्म जिज्ञासा' उद्देश्य है। जिस स्थानमें लिखा हुआ द्रष्य नहीं • यहो पहला सूत्र है।. इससे जाना जाता है, कि ब्रह्म मिलता, वहां उसके बदले में दूसरे द्रव्य से काम चलाया