पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७२१

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मोगांसा ब्राह्मण उनको व्याख्यास्वरूप है । आचार्य शवर स्वामीने , रचयिता कहते हैं, कि कम ही वेदका अर्थ है। जिन क्रमांक अपने भाष्यके अनेक स्थानों में ही ब्राह्मण भागको द्वारा किसी प्रकार दुनियादारी नहीं चलती और जिन्हें मन्त्रों की व्याख्यास्वरूप कहा है। । लौकिक "माणको सहायताके बिना हम लोग नहीं समझ ___"ब्रहाणो वेदस्य ब्याख्यानामति माझणम् ।" सकते, घे ही कर्म घेदके प्रतिपाद्य विषय हैं। .. वेद ऋक्, यजुः और साम इन तीन भागों में विभक्त जेमिनिने सम्पूर्ण चेदविभागों के ऊपर लिखे लक्षग हैं। इन्हें छोड़ और भी दूसरे तरह के विभाग हैं, ये और उदाहरण दिवा ममों में विधि, अर्थवाद, मन्त्र और सब विभाग इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा, नाराशंसी, नामधेय इन चार प्रधान विभागोंको स्थिर किया है। इत्यादि नामोंसे प्रसिद्ध है। घेदके उस अशको जिसमें पश्चात् उन्होंने उनके द्वारा धर्म और धर्म-जनक पुरानी घटनाओं का वर्णन है, इतिहास कहते हैं। पूर्वा-! याग, दान और होमादि कम्मों के स्वरूप और अनुष्टान- धमधा प्रकाशक वेदांशको पुराण, काव्याकर्तध्य विष प्रणालीको निश्चित किया है। मोमांसक लोग कहते हैं यक चेदभागको कल्प, प्रशंसा और गानयोग्य सन्दर्भको , कि वैदिक वाक्यको याग, दान या होमस्वरूप जो अर्थ गाथा तथा मनुष्य चरित्र-वोधक सन्दर्भको नारा नहीं निकल सकता उसका प्रमाण नहीं है अर्थात् उसको शंसो कहते हैं । वेदके ऋक आदि जो तीन भाग हैं। वेद नहीं कह सकते। यही जैमिनिका कर्मवाद है। उनके लक्षण इस तरह निर्धारित हुए हैं । अवयव । "तेपामृक् यथार्थवशेन पाव्यवस्था" "गोतिषु छः दर्शनों में मोमांसा दर्शन सबसे बड़ा है। इसके सामाख्या" "शेप यजुःशब्दः" मन्ल और ब्राह्मण होना । १६ अध्याय हैं। पहले १२ अध्यायों में पादसंख्या ४८ है।

प्रकार वेद वाफ्यों में जो पाक्य अर्थानुसार पादवद्ध हैं ' सूत्रसख्या हजारसे कुछ कम और अधिकरणसंख्या

घे सय ऋक कहलाते हैं । जो सब वाक्य गाये जा भी हजार है। मधिकरणका अर्थ विचार है। मीमांसा. सकते हैं ये साम और बाकी यजुः कहलाते हैं। ऋक्, शास्त्रका प्रत्येक अधिकरण पांच अवयवका है अर्थात् यजुः और साम पे तीन भाग पूर्वकथित दोनों भागों के . पांच अवयवमें समाप्त होता है। अन्तर्गत है। "विषयो विशयीय पूर्व पत्नस्तथोत्तरम् । समचे वेदसे हम लोग जो समझते हैं उसीको निर्णयति पंचास शायधिकरणं स्मृतम् ।" (भट्ट) समझाने के लिये पूर्वमीमांसाको रचना हुई हैं। और तो विषय-विचाय वाफ्य, जिसका विचार किया जायगा। क्या, पूर्व मीमांसाको सहायताके विना वेदका प्रतिपाद्य : विशय-संशय ; पूर्णपक्ष-संशयके अनुसार किसी अर्थ क्या है, उसे हम लोग नहीं समझ सकते । इस एक पक्षका अवलम्यन ; उत्तर-पूर्वापक्षके दोयोको लिये ऐसा कोई न समझे, कि पूर्वमीमांसा चेदको एक दिखलाना; निर्णय-दोषों को दूर कर अपने पक्षको टोका या भाष्य है । यास्तव में मोमांसादर्शनके एक सिद्ध करना। निर्णयका दूसरा नाम सिद्धान्त है। भी सूत्र, वैदिकपदकी व्याख्या नहीं है। फिर भी अपर लिखे शास्त्रके पांच अंगोंका तात्पय पूर्वमीमांसाको सहायताके निा वेदार्थ समझनेका कोई । यों है-पहले अंग विषय अर्थात् विचार्य वाफ्यका उपाय नहीं। - उल्लेख रहता है। दूसरे में उसके अमेिं मशय किया . अत्यन्त प्राचीन कालसे उपदेशके कितने ही याफ्य; जाता है। तोसरा अंग पूर्णपक्ष है। चौथे अहमें इस देश में प्रमाण माने जाते हैं, इन सय वाक्योंसे लोग पूर्वापक्षका प्रतिवाद रहता है। पांचवें अर्थात् अन्तमें जिसे कत्र्तव्य समझते हैं वहीं वास्तविक मनुष्यको प्रामाणादिके साथ सिद्धान्त निश्चित किया जाता है। कर्तव्य है। यही सब वाक्य "वेद" के नामसे प्रसिद्ध । इस प्रणालोके अनुसार किये गये विचारको मीमांमा. हैं। ये घेद श्रेष्ठ लाभका एकमात्र उपाय है। शास्त्रमें अधिकरण कहने हैं। • चेदका अर्थ क्या है ? इसके उत्तर में पूर्व मीमांसाके न्याय भादि शानोंके प्रिचारके पांच अंग है, . Vol. xvl, 161