पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७२२

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मामांसा मोमांसा शास्त्र के विचारके भी पांच जग है। इन दोनों पूर्वपक्ष–वेदाध्ययन के बाद ही समावर्तन होता है, में अन्तर यही है, कि मीमांसा घेद वाक्योंका विचार इस विधिके वल अध्ययनके याद ही सगावर्तन करना है और न्याय शास्त्रमें दृश्य पदार्थों तथा उनसे उत्पन्न कर्त्तव्य है। शानका विचार किया गया है। उत्तर-पक्ष-"स्वाध्यायोऽध्येतयः" यह विधि केवल गौर सय दर्शनों के जैसा मीमांसादर्शन भी सूत्रों में अक्षर प्रत्यक्षर अर्धा ग्रहण करने नहीं कहती, तात्पर्य लिखा गया है। हर एक सूत्रकी रचना पंचाङ्ग विचार ग्रहण करनेका भी उपदेश देती है। लेकिन विचारके विना प्रणालोके अनुसार हुई है। तात्पर्णका शान नहीं हो सकता । अतएव अक्षरभक्त होने __मीमांसाके प्रथम सूत्रमें धर्म-विचारको आवश्यकता से निश्चित ज्ञान प्राप्त नहीं होता और निश्चत ज्ञान न । की विवेचना हुई है और दूसरे सूत्रके आरम्भसे ले कर मिला तो अध्ययनको सफलता हो नहीं सकती । इस पादके अन्त तक घर्मा घया है ? धर्माके लक्षण क्या हैं? लिये समझना चाहिये, कि साधारण अध्ययनको याद हो धर्म किन प्रमाणोंका प्रमेय अर्थात् सिद्धान्त है इस सब समावर्तन करना होगा, ऐसी विधि नहीं है। विषयों के विचार तथा मोमांसा हुई है। दूसरे पादके | . सिद्धान्त-उक्त कारणसे अध्ययन समाप्तिके वाद भो आरम्भसे ले कर अन्त तक धर्मके, साधन फल तथा धर्मजिज्ञासाके लिये गुरुके घर पर कुछ समय तक रहना धर्म-मूल वेर्दोका प्रामाण्य स्थिर किया गया है। अवश्य कर्तव्य है। आलोच्य विषय । ___ मीमांसक आचार्योंने जिस प्रकार सूत्रोंको अधिकरण. इस दर्शनका प्रधान आलोच्य विषय है "अथातो में शामिल किया है उसका एक दश दिखलाया जा धर्म जिज्ञासा" पहला सूत्र । इसका अर्थ यह है, धर्म चुका। इसी दर्शनमें वरावर इस प्रणालीसे काम लिया गया जिज्ञासा इसका नाम है या विचार द्वारा धम्मतत्त्व है। "अथातो धर्मजिज्ञासा" इस सूत्रमें धर्म शब्द अधर्म जानना अवश्य कर्त्तव्य है। शब्दका उपलक्षक है अर्थात् धर्मफे जैसा अधर्मको भी केवल वेदवोध्य अर्थ हो धर्म है तथा वेद हो धर्मके | जिज्ञासा करनी चाहिये। धर्मकी जिज्ञासा जैसे धर्म- प्रमाण है। इसलिये ब्रह्मचारी वेदाध्ययनके बाद भी | प्राप्तिके लिये करनी होती है उसी प्रकार अधर्मसे बचने के गुरुकुलमें पास कर धर्माको जिज्ञासा फरे । यहां | 'लिये अधर्मकी भी जिज्ञासा करनी चाहिये । फलतः धर्म- जिज्ञासा शब्दका अर्थ विचारपूर्वक ज्ञानगोचर करना! लक्षणको निश्चित होने पर विपरीतके कारण अधर्मके है। इस सूत्रका भी अधिकरणके अनुसार समझना होगा। लक्षण मापे आप निश्चित हो जाते हैं। इसके लिये अर्थात् अधिकरणके अनुसार इसका अर्थ स्थिर करना अलग विचारको आवश्यकता नहीं पड़ती। भावश्यक है। . धर्म। . अधिकरण। औमिनिने धर्मके ये लक्षण बतलाये है-"चोदना. विषय-"स्याध्यायोऽध्ये तथ्यः" "वेदमधीत्य स्नायात्" | 'लक्षणोऽर्थो धर्मः।" चोदनाफा अर्थ प्रवर्तक वाक्य है वेद मध्ययन करे और वेद अध्ययनके बाद स्नान अर्थात् इसका दूसरा नाम विधि और नियोग है। लक्षण-इस- समावर्तन करना पड़ता है। (वेदको अध्ययन करने का अर्था ज्ञापक यो योधक । अर्या-अनिएविपरीत अर्थात् वाले प्रहावर्यग्रतको समाप्त कर गृहस्थी में प्रवेश करनेसे श्रेयस्कर । जिसका शापक या बोधक विधियाफ्य है, जो पहले जो विधियुक्त कर्म करते हैं, उसका समावर्तन अनर्थ विपरीत अर्थात् श्रेयस्कर या इट है उसे ही धर्म है)। यह विधिवाक्य विचारनेके जोग्य विषय है। कहते हैं। तात्पर्य यह, कि विधियोधित भविष्यत् श्रेय ___ संशय-घेदके अध्ययनफे वाद हो समावर्तन | एकर क्रियाकलाप याग, दान और होमादि धर्म कहे जाते करना होगा, या कुछ समय तक धर्म निर्णयके लिये हैं। इसका प्रमाण चोदना अर्धात् वैदिक विधियाक्य गुरुगृहमे रहना आवश्यक होगा? है। क्रियाकै अभावमै आत्मामें उत्पन्न भविष्यत मंगलके