पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७२८

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मीमांसा वेदयायका प्रामाण्य उपरोक्त युक्तियोंसे किया जा। निधन निरयव द्रव्य है। शब्द अन्याय दर्शनों में आकाश- सकता है। का गुण और उत्पन्न प्रध्वंसी है, किन्तु मीमांसादर्शनके कारणदोप और याधकशानयर्जित अगृहीतमाही | मतानुसार यह अनादि और अविनाशी है। . ज्ञान ही प्रमाण है अथवा अशात झापक अवाधित या ___स्फोटवाद। अविसंवादी विधान हो प्रमाण है। यह लक्षण शाम्द मनुष्य सङ्कतात्मक वषिय नामक ध्वनिविशेष शानमें सम्पूर्णरूपसे विद्यमान है। (कएठध्वनिमाल ) उद्भावन द्वारा उन सयोंका आकार __शास्त्र मन्द विज्ञानात् असन्निकृष्टेऽर्थे विज्ञान शातार्थ दूसरेके शानमें थैठाता है और कुछ नहीं करता। जो गव्द सुननेके वाद पदार्थबोध द्वारा जो वाफ्या- सुना जाता है, अर्थात् जो कर्णगोचर होता है, वह शब्द विज्ञान उत्पन्न होता है, वही वाफ्यार्थ विज्ञान नहीं। यह यथा अवस्थित उन शब्दोंके व्यजकरूप कण्ठ- अतिस यादो या अबाधित असनिकृष्ट और अज्ञात विषय | ध्वनि है । सङ्कतमय फएउध्वनि द्वारा नित्यनिराकार में अव्यभिचारी है; अतएव प्रमाण है। यह शन्दविज्ञान शन्दका व्यवहार सिद्ध हुआ करता है। जैसे अक्षर सर्यापेक्षा उत्तम और पूर्ण प्रमाणके नामसे प्रसिद्ध है। रूपी साङ्केतिक रेखा द्वारा आकाररहित ध्वन्यात्मक शब्द ___ यह प्रमाण दो भागोंमें विभक्त है, पौरुपेय और का ज्ञान र व्यवहार निप्पन्न होता है, वैसे ध्वन्यात्मक अपौरुषेय। आप्तवाक्य पीरुपेय है और घेदवाक्य शब्दके द्वारा भो आकाररहित, अदृष्टच, नित्यावस्थित अपौरुषे ।। जो शब्द है, यह दोपप्रस्त नहीं -दोष वक्ता शब्दका ज्ञान भी व्यहार-सम्पा हुमा करता है । क्रम, छेद, का है। चनाके दोपसे ही शब्दमें दोप आरोप होता है। भङ्ग ओर मृदु मधुर या कांश समो ध्यनिस्थित या इसीलिये आप्तप्रणोत चाफ्य विसंवादिनी बुद्धि उत्पन्न ध्वनिका गुण शब्दमें भारोपित होता है, इससे लोग करता है, किन्तु आप्तप्रणीत यायप अथवा अनादि अपी. कहते हैं, कि यह शब्द कोश या मधुर है। मीमांसकों. रुपेय वाफ्य संवादी होता है। किसी समयमें भी यह असं: के मतसे ध्वनि शब्द नित्य नहों, वर्ण शब्द नित्य है। वादिनी युद्धि अथवा मिथ्याशान उत्पन्न नहीं करता। न वर्णपद, वाक्य सभी नित्य या निरययय है ये ही नित्य- उत्पन्न करनेका कारण चाहे आप्तप्रणीत हो या अपौरपेय। नित्यय वर्ण, पद और वाफ्य स्फोट नामसे प्रसिद्ध है। ___ अपौरपेय भी दो तरहका है-एक सिद्वार्थ, ध्वन्यारुढ़ वर्ण, पद और शब्द सुननेके बाद श्राता- दूसरा विधायक है। जो सिद्ध यस्तु विषयक, के भीतर जो अर्था प्रत्यायक ज्ञानमय वर्ण, पद और विज्ञान उत्पन्न करता है, यह सिद्धार्थ है, जैसे-- याफ्यका उदय होता है यही अमूर्त पदार्था स्फोट है। यह तुम्हरा पुत्र है, इत्यादि वाफ्य। जो वाक्य कुछ निराकार वर्णकी, पदकी और वाफ्यकी प्रतिच्छाया है। करनेको कहता है, यह विधायक है, जैसे :-'स्वर्ग अथवा ये स्फोट हो अनादि निधन हैं। वर्ण, पद और कामायजेत्' स्वर्गको कामना कर याग करना, इत्यादि घाफ्प नामसे प्रसिद्ध हो इस तरह शब्दरहस्पके संसा- यापय । विधायक यापय भी प्राकारान्तरसे दो तरह धित करनेके लिये मोमांसकोंने नाना तरहको युक्तियों फा है, उपदेश और अतिदेश । 'यह कार्य इस तरहसे और तौका प्रयोग किया है। मोमांसकोंके मतसे केवल करना' इस तरहका चाफ्य उपदेश, 'अमुक कार्यके अनु; शब्द हो नित्य नहीं, यर शब्दशब्दार्थ और पाय. सार अमुक कार्य करना चाहिये' यह बाघय अतिदेश है। चाफ्याका बोध्यवोधक सम्बन्ध भी नित्य है। यह शब्दप्रमाणघादी मीमांसकोंको दूसरी एक गूढ । साङ्केतिक नहीं, वरं स्वामाविक है। पदपदार्थका पोय. अभिसन्धि दिखाई देती है। उसीके प्रमावसे मीमांसक। योधक सम्बन्धस्सामायिक बनायटो या सङ्केतमूलक शब्दको खतः प्रपाण फद्दनेसे नहीं डरते। इनको अभि- नहीं। यह निम्नत युक्तियोंसे प्रतिष्ठित दुधा है। सन्ध्र यह है, कि काल, दिक मात्मा, प्रमाणु आदि जैसे शाद और अर्थको आपसमें निःसम्पर्कता नहीं है। अनादि निधन निरयय द्रव्य है, उसी तरह शब्द भी अनादि सम्पर्क या. सम्यंग्य रहने पर भी यह प्रसिद्ध संयोग