पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७२९

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मोपांसा समयाय आदिनहीं है और उनमें किसी तरहके कार्य-कारण हो सकता है, कि यह सम्बन्ध तय्यार फर नहीं देता, यथा- भाय आदि भी दिखाई नहीं देते। उसी कारणसे इनका, बस्थित सम्बन्ध कह देता है। तय्यार कर देनसे अश्या सिद्धान्त इस तरह है,-शब्दके साथ अर्थका सम्बन्ध गोशब्द उच्चारण करने के बाद अश्व कह देनेभे अभिन्न व्यक्ति है, यह संज्ञासंज्ञो, नोमनामी या बाधक बोध्य-इन तीनों उसको प्रहण नहीं करता, करने भी नहीं देता वरं में एक है। शब्द नाम है ...अर्थ उसका नामो है। शब्द उसका निषेध करता है। जिसको अभिश कहा गया, संज्ञा है-अर्थ उसका संज्ञो है। शब्द बोधक है--अर्थ यह भी शैशवमें अनभिश था और उसने भी दूसरेसे , उसका बोध्य है। अभिहित सम्बन्ध रहनेका प्रमाण शिक्षा पाई थी। इस तरह परम्पराक्रमसे अनुसन्धान प्रत्यक्ष है, अर्थात् गन्द प्रचारके अध्ययदित दोनों के बाद करने पर स्थिर रूपसे मालूम हो सकता है, कि सन्दके ही अर्थकी प्रतीत होना सबके अनुभवको यात है । फिर अर्थका और इन दोनोंका अनादित्व-सम्बन्ध स्वयं ही भी, प्रोक्त सम्बन्ध स्वाभाविक और अनादि प्रबाद स्थिरोकत हुआ करता है। परम्परागत है। इसको किसीने तयार नहीं किया, ___यदि ऐसा है, कि भादि मृपिकालमें भगवान् अथवा सङ्केत स्थापना द्वारा प्रचार भी नहीं किया । स्वयम्भूने पहले स्थावर जङ्गम, धर्मा धर्म और शब्द- जो कहते हैं, कि शब्द वक्ताके हृदयगत अभिप्रायका | काण्डकी सृष्टि कर उन सवीके व्यवहार्य शब्दोंके साथ अनुमापक होना है, तो पूछना यह है, कि रोगविशेष भर्थके सम्बन्धको कल्पना की थी, पोछे उन सयोंको सम- स्था या स्वप्नावस्थामें उच्चारित अर्थाभिप्रायशून्य मानेके लिये कृतसङ्केत शब्द सन्दर्भित कर अर्थात् वेद शब्दों के अर्थ में प्रतीति क्यों होती है ? अर्थानमिनको पात | प्रस्तुत कर मरीच्यादि पुतोको दिया था ! पीछे मरो भादि कैसे समझमें था जाती है ? प्रत्युत्तर देने में असम होने पुबॉने अपने नीचेवालोंको और उन्होंने फिर अपनेसे जो पर भी यह स्वीकार करना उचित है, कि शब्द यथा | नीचे थे उनको दिया। इसी तरह हम प्राप्त हुआ है, तो यह पस्थित अर्थका ही प्रत्यायक है; अभिप्रायविशेषका अनु संगतियुक्त हो सकता है सहो; किन्तु इस सिद्धान्तमें प्रमा- मापक नहीं। इसके उत्तरमें यह कहा जा सकता है,। णाभाव है। ऐसा कोई प्रमाण दिखाई नहीं देता जिसके ,कि नव पहले सुननेसे ही समझमें क्यों नहीं द्वारा इस तरहका ज्ञान संवादी हो सके। इसमें और मा जाता ? अर्धाप्रतीति श्यों नहीं होती? इसका एक दोष होता है, कि साङ्कोतिक शब्दार्थ घरिन नाराके यथार्थ प्रत्युत्तर यह कि सहकारीको कारणों का अभाव ! प्रमाणको रक्षा कठिन हो जाती है। परबत्ती साङ्कतिक -है। सहकारी कारण संगाशान हैं, उसका अभाव शब्दार्थ घटित शास्त्र किस तरह पूर्वयत्तों विषयोंका - अर्थात् उनका न होना या न रहना। नेत्र जैसे प्रकाशके | साक्ष्य प्रदान कर सकता है । मतपय पहले कुछ भी साहाय्यके विना अर्थका दर्शन नहीं करते और कराते | नहीं था, होने पर भी इसका कुछ प्रमाण नहीं। भी नहीं, वैसे शब्द भी संज्ञा संविधान न रहनेसे श्रोता. भादि सृष्टि और महाप्रलयका कुछ प्रमाण न रहने. - के वित्तमे स्वार्थ-प्रत्यय नहीं उत्पन्न करता। जिन्होंने से ब्रह्मा द्वारा पदपदार्थो का सम्बन्धकरण प्रमाण रहित दूसरोंसे अर्थकी संशा या नाम मालूम किया है, शब्द उमी) है। श द भी असंख्य हैं और अर्थ मी असंख्य । मनुष्यफे भीतर स्वार्थप्रमिति उत्पन्न करेगा। एक एक करके उन सवों का सम्बन्ध करण एक व्यक्तिके चादी ग्रहां इस तरह पूर्वपक्ष कर सकेंगे। वे कह लिये असम्भव है । यदि किसी भी शब्दका अर्थ के सकते है, कि शब्दार्थका सम्बन्ध पौरुषेय है, अर्थात् | साथ नैसर्गिक रूपसे सम्बन्ध न हो, तो यह अशक्य- पुरुपकृत सङ्केत मूलक है। पहले उसे अभिशोसे जान करण हे या नहीं, विचारना चाहिये । सम्बन्ध कारण लेना चाहिये। जिसको दुसरा कह देता है, या दुसरा करने पर किसी न किसी पायरको आवश्यकता होती ही शिक्षा देता है, यह कैसे पौरपेयके मिया अपौरुषेय | है। यदि उस रायके अथके समझाने की मामध्यन हो सकता है। - पूर्ण पक्षके प्रतिपक्षमें यह कहना यथेष्ट ! हो, तो वह फोन निर्याह कर सकता है। बालुका तेल _Vol. III. 163