पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७३०

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मीमांसा यतएव उसके अनुवाद या उच्चारणके सिवा अन्य किसी पन्धनमें जीव बंधा हुआहै । यदि उसके साथ सम्यन्य ही विषय- पुरुषका कत्तं त्य नहीं है। . रहा, तो मुक्ति हुई किस तरह ? सुतरां प्राकृतिक कोई ... गरीर भौतिक है, आत्मा उमसे भिन्न है। इस भो बन्धन रहनेसे मुक्तिको सम्भावना नहीं मीमांसकों दर्शन मतसे आत्मा अनेक और प्रति शरीर में भिन्न, के मंतसे मन रहनेसे ही मुक्तजीव अनन्त काल के लिये अजर, अमर और शानशक्तिविशिष्ट है। -आत्मा सुख, अपरिच्छिन्न सुग्नका स्वादमाही होता है। .... . दुःन भोक्ता है और मानस अप्रत्ययका अधिगम्य है। - चैतन्य अर्थात् ज्ञानशक्ति, आनन्द अर्थात् सुख, आत्मा विभु है, अत्माकी शान, शक्ति आदि शरीरमें ही : नित्यत्व और विभुत्य अर्थात् सर्वश्यापित्व-ये ही सब स्फुर्ति होती है, शरीरके बाहर नहीं। शान मात्मा- आत्माके अपने धर्म हैं। जव जीवका मोक्ष होता है, उस को शक्ति या गुण है। मोक्षकालमें आत्मा इन्द्रिया- समय उसमें ये सय विद्यमान रहते हैं। इसका उच्छेद .. तोत आगमपायिनी बुद्धि और सुख आदिसे रहित हो। होता। जाती है और स्वरूपगत ज्ञानशनि और सुग्व आविष्कृत मोक्षको प्रणालो-काम्य, : निषिद्ध · शारोर और . होता है। ... . मानस क्रियाका वर्जन कर फेवल निष्कार नित्य नैमित्तिक इस मतसे सगैलुखविशेष और नरक दुःखविशेष है। कर्ममें रत रह सकने पर या आत्मतत्त्व शानमें डुये रहने यह शरीर स्थानभेदसे भोग्य है। वर्ग सुखका : पर पूर्णजन्मके कारणीभूत धर्माधर्मको उत्पत्ति राक भीर नरक भोगका उपभोग्य भोग्यस्थान भी है और जाती है। सञ्चित धर्माधर्म भो दग्ध घीजकी तरह शरीर भी है। निःशक्तिवानं हो जाता है। जब तक देद रहती है, तब • जो धनतिशय आनन्दस्वरूप और दुःखविवर्जित है | तक जो भोग होता है, उसी भोगसे प्रारब्ध कर्म क्षयको घहो स्वर्ग है। अथवा जहां कभी दुःखदैन्यका दर्शन । प्राप्त होता है। सुतर सुख दुःख और शरीरोत्पत्ति नहीं होता और अभिलापोपनीत होता है अर्थात् उसका कारणीमृत प्रारब्ध सञ्चित और भागामी धर्माधर्मके की इच्छा होते ही उत्पन्न होता है, यही स्वर्ग है । इसी। ममायमें भविष्यत्में सुख दुःख और शरीर उत्पन्न नहीं स्वर्ग के लिये जीय प्रार्थना करता है । यागादि कर्म द्वारा होता। याद न होनेसे ही मोक्ष है। मुक्त तय गशरीर हो जीयको स्वर्ग प्राप्त हुधा करता है। केवलमान मूल मनको ले कर अनवरत भात्म मुखास्याद..

· वैशेषिक दर्शनकी तरह इस दर्शनके मतसे सुख से परितृमामा करता है।

दुःखादि विशेष गुणोंके विच्छेदसे ही मोक्ष होता है। शास्त्रमें जिस तत्त्वज्ञानको प्रशंसा दिखाई देती है, भोगायतन शरीर, भोगसाधन और भोग्यविषय यहसय : यह यशाङ्ग और मोक्षाङ्ग दो तरह का है। यशादिकालका प्रपञ्चान्तर्गत हैं। हातएव विधायिभक्तप्रपञ्च उक्त तीन आत्मशान यशफलका पोषण करता है, फलका प्रकारसे पुरुषको बन्धन करता है, अर्थात् भोग कराता आधिषय उत्पन्न करना है और मार्वभौमिक मात्मान है। भोग शब्दका अर्थ-सुखदुःखका ...... मोक्षफलके कारणभाषको प्राप्त होता है। ... है। इन तीनोंका सम्यन्ध परित्याग · कर कर्मका.। । मदृष्ट शुभाशुभ भेदसे दो तरह-