पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७३४

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६५६ मीमांसा मीमांसा ग्रन्थ कह कर स्वीकार नहीं किया जा सकता। ' हिन्द शास्त्र के मतसे गाईस्थ्यधर्म प्रतिपालन करने. सिवा इसके उत्तर और पूर्वी दोनों मोमांसासूत्रोंमें जैमिनि से पहले चैदिक कर्मकाण्ड आवश्यक है। इसीलिपे और बादरायणका नामोल्लेख रहनेसे किसोको भो मागे जेमिनिका कर्मकाण्डात्मक दर्शन पूर्य मीमांसा या पीछेका नहीं कहा जा सकता। कर्म मीमांसा नामसे प्रसिद्ध है और जोवनके उत्त- ___ जय नाना सम्प्रदायोंके अभ्युदयमें ज्ञान और रांग या शेष जीवनमें आलोच्य वैदिक ज्ञानकाण्ड कर्मकाएडानुरागो विभिन्न लोगोंमें वैदिक क्रियाकलापके | | समझने के लिये जो दर्शन प्रवर्तित हुगा है, घही उत्तर अनुष्ठानफे सम्बन्ध मतभेद चल रहा था, जब कर्म- मीमांसा या ब्रह्मसूत्रके नामसे प्रसिद्ध है। काण्डको ओर सयको दृष्टि पड़ो, प्रत्येक यशके प्रत्येक ___मामांसासूत्रको समझानेके लिये जिन महात्माोंने कार्यमें क्या करना होगा, सभीको जान लेनेको आध. लेखनी उठाई थी, उनमे हम भगवान उपवर्षका नाम सबसे श्यकता हुई, मूलप्रणालीको भूल कर लोग जय एक ही! पहले देखते हैं। शयरखामी और उनके गादके वार्तिक और यज्ञको भिन्न भिन्न प्रणालीसे फरने लगे, जब प्रत्येक टीकारारोंने मी उन उपवर्षको हो यत्तिकारके नामसे उल्लेख अनुष्ठानमें विरोध उपस्थित होनेको संभावना हुई, किया है । दुःखका विषय है, कि इस समय उपयर्षको पृत्ति उसी समय मीमांसाशास्त्रको आवश्यकता हुई थी ।। नहीं मिलती। इस समय जो सब भाध्य और टोकाये एक मीमांसा चाहिये, लेकिन किस तरहकी मोमांसा | मिलता हैं, उनमें शवरस्वामीका भाग्य ही सबसे प्राचीन चाहिय, घर समझाने के लिये आलेय, लायुकायन, है। उन्होंने विस्तृतरूपसे मोमांसाशास्त्रको समझानेको ऐतिशायन आदि नाना मुनियोंने अपना अपना मत प्रथम चेष्टा की। (शवरस्वामी शब्द देखो) . प्रकाशित किया। किन्तु इस पर भी सर्वाङ्गसुन्दर शवरस्वामीने जो भाष्य किया था, उसको दार्शनिक मीमांसा न हुई। अन्तमें महर्षि अमिनिने सभी मुनियों- भावसे समझाने के लिये कुमारिलभट्टने मीमांसापातिक फे मोंकी समालोचना कर वैदिक मियाकाएड समझा - का प्रचार किया। फुमारिलने शवरस्वामीके भाष्यक देनेके लिये "जैमिनिसूत"का प्रचार किया । सृष्टान | प्रथम अध्यायके प्रथम पद पर जो वार्तिक प्रचार किया, धर्मयाजकोंने वाइविलके तत्त्वाङ्गोंके समझानेके लिये उसका नाम श्लोकयात्तिक है। प्रथम अध्यायफे द्वितीय जैसे Hernuencutic तस्यका प्रचार किया है, जैमिनिने पादसे ले कर तृतीय अध्यायके चतुर्थ पाद तक जो वात्तिक उस तरहसे मोमांसा शास्त्रका प्रचार नहीं किया। प्रचार किया, उसका नाम तन्त्रवात्तिक । चतुर्थ अध्यायके धर्मयाजकोंने बाइबिलके जितने प्रकारके पाठोंको स्वीकार पञ्चम पादसे द्वादश अध्याय तक फुमारिलने जो यातिक किया है, उनके समन्वयको ओर Hermeneutic (हेर किया, यहो "टुप् टीका" नामसं विख्यात है। मीमांसा. मेण्टिकों ) का लक्ष्य हैं। ये यायिल शब्दको प्रधान धर्म | शास्त्रको बहुतेरे दर्शन (IPhilosinophy) कहने में पुण्ठित . कप फर उतना निर्भर नहीं करते, किन्तु घेदका शब्दः । होते हैं, किन्तु गधिक पया फाहा जाय, महामति कुमा- याद हो जैमिनिका प्रधान लक्ष्य है। उनके मतसे वेदका रिलमट्टने ही श्लोकवार्तिको मोमांसाको दार्शनिकता प्रत्येक शब्द ही अपौरुषेप आप्त-याप है। यह शब्द-1 स्थापन को है। श्लोफयात्तिकको एक उत्तम दर्शन प्रग्य बाद समझ जाने पर वैदिक धर्म समझमें आता है। कहनेगें फिमीको कोई यापत्ति नदी होगी। इसीसे शब्दवाद या वेदको अपीयपेयता प्रतिपादनपूर्वक (कुमारिमभट्ट शब्दमें विस्तृत विवरण देखो) घेदफै ग्राह्मणमागमें जो सय यागयज्ञादिक है ये सब कुमारिल द्वारा श्लोकवातिक रचित दोनेसे पहले किस तरह किस उपायसे सम्पन्न होंगे, और उनके श्लोफमें रचित "संग्रह" नामसे एक मीमांसामन्य प्रव. उपलक्षमें किस स्थल में किस भायमें मन्त्रका प्रयोग करना लिन था। मीमांसादशेनगें सोफामारने इस 'संप्रदका होगा, उसोका सम्यक विचार कर जैमिनिने मीमांसा. उलेम किया है, किन्तु इस समय यह नहीं मिलता। शारज स्थापन किया है। 1. हम कुमारिलफे याद प्रमिद मीमांसक प्रभारको