पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७३६

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मीमांसा मीमांसा प्रन्य रुढ़ कर स्योकार नहीं किया जा सकता। हिन्दु शास्त्र के मतसे गार्हस्थ्यधर्म प्रतिपालन करने. सिया इसके उत्तर और पूर्वा दोनों मोमांसासूत्रों में जैमिनि ! से पहले वैदिक कर्मकाण्ड आवश्यक है। इसीलिये और चादरायणका नामोल्लेख रहनेसे किसीको भो आगे। जैमिनिका कर्मकाण्डात्मक दर्शन पूर्व मीमांसा या । पीछेका नहीं कहा जा सकता। का मीमांसा नामसे प्रसिद्ध है और जोयनके उत्त- जब नाना सम्प्रदायोंके अभ्युदयमें धान और रोग या शेष जोवनमें आलोच्य वैदिक शानकाण्ड कर्मकाएडानुरागो विभिन्न लोगोंमें वैदिक क्रियाकलापके समझनेके लिये जो दर्शन प्रवर्तित हुआ है, वही उत्तर- अनुष्ठानके सम्बन्धमें मतभेद चल रहा था, जब कर्म मीमांसा या ब्रह्मसूत्रके नामसे प्रसिद्ध है। काण्डकी ओर मधकी दृष्टि पड़ी, प्रत्येक यशफे प्रत्येक ___ मोप्रांसासूत्रको समझानेके लिये जिन महात्मामोंने कार्यमें क्या करना होगा, सभोको जान लेनेकी माय लेखनी उठाई थो, उनमें हम भगवान उपवर्षका नाम सबसे श्यकता हुई, मूलप्रणालीको भूल कर लोग जव एक ही पहले देखते हैं । शवरस्यामी और उनके गादक यातिक और यतको भिन्न भिन्न प्रणालीसे करने लगे, जय प्रत्येक टीकाकारोंने भी उन उपयर्षको हो वृत्तिकारके नामसे उल्लेख अनुष्ठानमें विरोध उपस्थित होनेको संभावना हुई, किया है । दुःखका विषय है, कि इस समय उपवर्षको पत्ति उसो समय मीमांसाशास्त्रको थावश्यकता हुई थी। नहीं मिलती। इस समय जो सब भाप्य और टोकाये पफ मीमासा चाहिये, लेकिन किस तरहकी मोमांसा | मिलता हैं, उनमें शवरस्वामीका गाय ही सबसे प्राचीन चाहिये, यह समझाने के लिये आत्रेय, लायुकायन, है। उन्होंने विस्तृतरूपसे मोमांसाशास्त्रको समझानेको ऐतिशायन शादि नाना मुनियोंने अपना अपना मत प्रथम चेष्टा को। (शवरस्वामी शन्द देखो) . प्रकाशित किया। किन्तु इस पर भी सर्वाङ्गसुन्दर शयरस्वामीने जो भाष्य किया था, उसको दार्शनिक मीमांसा न हुई। अन्तमें महर्षि जैमिनिने समो मुनियों- भावसे समझानेके लिये कुमारिलभहने मीमांसापातिक फे मतोंकी समालोचना कर चैदिक क्रियाकाण्ड समझा का प्रचार किया। फुमारिलने शवरस्वामीफे भाष्यफ देनेके लिपे "जैमिनिसूत्र"का प्रचार किया । खष्टान प्रथम अध्यायके प्रथम पद पर जो पार्तिक प्रचार किया, धर्मायाजोने याइविलके तत्त्वाद्दोंके समझानेके लिये उसका नाम श्लोकवात्तिक है। प्रथम अध्यायफे द्वितीय जैसे Hermeneutic तत्त्वका प्रचार किया है, जैमिनिने । पादसे ले कर तृतीय अध्यायके चतुर्थ पाद तक जो यात्तिक उस तरसे मोमांसा शास्त्रका प्रचार नहीं किया। प्रचार किया, उसका नाम तन्त्रघातिक है । चतुर्थ अध्यायके धर्मयाजकोने यायिलफे जितने प्रकारफे पाठोंको स्वीकार, पञ्चम पादसे द्वादश अध्याय तक कुमारिलने जो यात्तिक किया है, उनके समन्वयको ओर Hermeneutic (हेर- किया, यहो "टुप् टीका" नामसे विख्यात है। मीमांसा. मेरिटकों )-फा लक्ष्य है। ये वादविल शम्दको प्रधान धर्म मात्रको बहुतेरे दर्शन (1Philothophy) काहने में कुण्ठिन कह कर उतना निर्मर नहीं करते, किन्तु येदका शब्द होते हैं, किन्तु गधिक क्या कहा जाय, महामति कुमा. याद ही जैमिनिका प्रधान लक्ष्य है। उनके मतसे चेदका | रिलभट्टने ही श्लोकयाम्किमें मोमांसाको दार्शनिकता प्रत्येक शब्द ही अपौरपेय आप्त-याफ्य है। यह शब्द. स्थापन की है। श्लोकयातिकको एक उत्तम दर्शन प्रमा याद समम जाने पर वैदिक धर्म समझमें आता है। कद्दमें किमीको कोई आपत्ति नहीं होगी। इसीसे शब्दवाद या घेदको अपारपेयता प्रतिपादनपूर्वक (कुमारिक्षमहशम्दमें विस्तृत विवरण देण्यो) घेदफे माधणभागमें जो सय यागयज्ञादिक हैं वे सत्र ___ कुमारिल द्वारा श्लोकवार्तिक रचित होनेसे पहले फिस तरद किस उपायसे सम्पन्न होंगे, और उनके | श्लोकमें रचित "संग्रह" नामसे एक मीमांसामग्य प्रच. उपलक्षो किस स्थलमें किस माय मन्त्रका प्रयोग करना लिन था। मीमांसादर्शनमें टीकाकारने इस 'संप्रदका होगा, उमाका सम्यक विचार कर समिनिने मोरांसा उल्लंघशिया है. किन्तु इस समय यह नहीं मिलता। शारण स्थापन किया है। हम फुमारिलफे बाद प्रमिद मीमांसक प्रभाकरको .