पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७६३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


६७६ मोरट भी इस यातका साक्ष्य प्रदान कर रही हैं। फिर श्यों । के महमूदने उनको पराजित कर उन्हें मुमलमान "शताब्दी के मुसलमानी आक्रमणों के बादसे तो यहांका बनाया और उनसे कर वसूल किया था। यही घटना

धारावाहिक रूपसे इतिहास मिलता है। उससे पहलेको इतिहासमें सिपहसालार समाउदका आक्रमण" के

किसी घटनाको किसी ऐतिहासिक प्रमाणोंसे सिद्ध नामसे प्रसिद्ध है। करनेका कोई उपाय नहीं। विष्णुपुराणके अनुसार अधि. ___सन् ११६१ ई० में महम्मदगोरोके प्रसिद्ध सेनापति सीमकृष्णके पुन निचक्षुके राज्यकालमें हस्तिनापुरो कुतुबुद्दीनने मेरठ पर अधिकार कर वहाँफे हिन्दू-मन्दिरों- गंगाके गर्ममें विलीन हुई। इसके बाद इन्होंने अपनी को नष्ट भ्रष्ट कर मसजिद बनवाई थी। इसके बाद राजधानी कौशाम्यो नगरमें स्थापित की । निवासे २१यों पठान राजे यहांका शासनकार्य चलाते थे। मन् १३९८ पीढ़ी के राजा क्षेमर अपने मन्त्री द्वारा राज्यच्युत हुए थे। ई०के मुगल-तैमूरलंगके आक्रमण तक यहांका इतिहास घोस सन्नाट अशोकके समयमै यहां बौद्धकीर्ति दिल्लीके इतिहाससे जुड़ा हुआ है। तैमूरक मेरठ पर स्थापित हुई। उनके समयके दो पत्थरके स्तम्भ मिले | आक्रमण करने पर यहांके राजपूत उसके विरुद्ध परे हैं। इसके अनुसार ईमाके ४०० वर्ष पहले मौर्यवंशका | हुप । लोनो किले पर माफमण करनेफे ममय राजपूताने होना मायित होता है। इसके बाद ईसाके ५७ वर्ष पहले आपने अपने घरों में आग लगा दी जिससे परिवारको - यहां विक्रमादित्यका आधिपत्य रहा । इसके बाद दिल्ली- बच्चे और स्त्रियां जल कर राख हो गई। किले पर अधि में शकवंशीय राजाओंका बल बढ़ने के साथ साथ यहां कार करनेके याद लाखसे ऊपर वन्दी हिन्दु तैमूरके • भी उनका आधिपत्य हुआ। इसका प्रमाण यहांके मिले हुपमसे कत्ल कर दिये गये। तैमूर दिल्लीको लूट कर शकपंशीय कई सिफोंसे मिलता है। कई शिलालेख भी । मेरठ लौट आया। यहां पठान-सरदार इलियास रोज्य - इसका प्रमाण दे रहे हैं। करता था। तैमूरने इसको मार भगाया। ___ चीन-पर्यटक यूपनचुपंग वीं शताम्दोमें थानेश्वरके १६वीं शताब्दी के मध्यमार्गमे अव दिल्लीक '; दर्शनके लिये यहां आये थे। इन्होंने जो इसकी सीमा सिंहासन पर मुगलोंका प्रभाष था तब यथार्थमे निर्धारित की है, उससे मालूम होता है, कि मुजफ्फर मेरठमे शान्ति विराजती थी। मुगल-मम्नाट यमुना. नगरका दक्षिणांश, सारा मेरठ जिला और बुलन्द गहर- की इस उपत्यकामें शिकार खेला करते थे। का उत्तरार्द्ध उक्त राज्यको सीमामें था। उस समय। मुगल सम्राट औरङ्गजेशको मृत्युके बाद १७०२. 'थानेश्वर नगर कन्नोजराज हवद्धनके अधीन था। १७७५ तक यहां फिर राज्यलोलुप सिन और महा. ' । इसके बाद दिल्लीके राज-इतिहासके अनुसार हम | राष्ट्रियोका आगमन हुआ। इस विप्लबके समय उत्तर- देखते हैं, कि तोमरयंशीय राजा अनङ्गपालने अन्दाज | | दोआवमें जाटों और रहेलोका अनवरत उपदय था। 'सन् ७३६ ईमें यहा राज्य किया था। इनके वंशधर दिल्लीके मुगलोंकी प्रतिमाका अवसान होने के समय राजे मुसलमानों के उत्पातसे तंग आ कर कन्नौज छोड़। उत्तर-पश्चिम भारतमें अराजकताका स्रोत यह रहा था। 'कर अयोध्या बटो-नगर में आकर धस गये। इस ठीक इसी समय घाल्टर रोनहार (Natter Reinharkit) 'शके अन्तिम राजा ३२ अनंगपालक राजत्वकालमे | नामक एक यूरोपीय सैनिक अपने भाग्यको थाजमाइश चौहान राजविशालदेवने अधिकार किया। चौहान राज करनेके लिये उत्तर-पश्चिम भारत के इस रणक्षेलमें आ • वंशक बाद यहां मुसलमानोंका आधिपत्य हुआ था। पहुंचा। यह अपने वाहुपलसे मेरठ के सरधना परगने । सन् १९पों शताब्दीमें यह प्रदेश लूटेरे जाट और पर अधिकार कर यहांका शासन कर रहा था। सन् डोर-राजवंशकं हाथ आया। वरणाधिपति राजा अहो । १७७८ ई०में उसकी मृत्यु हो गई। उसकी पत्नी बेगम यण के वंशधर डोर सरदार हरदत्तने मेरठ नगरमें एक ' समास सम्पत्तिको अधिकारिणो हुई। यह रमणो • किला वनयारा । कहते हैं, कि मन् १०१६६०में गजनीफे ' अरव देशको एक वेश्याको पुती थी। रोन हार्ट ने इसके