पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७९८

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७०६ उत्पन्न होती है उसी प्रकार शूकरके दन्तकोपमें मो मुक्का, मेद किये गये हैं। गुणमें शपज मुक्का, सबसे निकट उत्पन्न होती है। ब्राह्मणादि चार वर्णों के जैसे शूरोंके। होती है। . भी चार वर्ण है, अतएव घराइज मुक्तायें भी तद जीमत मुक्ता-जीमूतफा अर्थ मेघ है, मेघसे उत्पन्न नुसार चार वर्षों में विभक्त हुई हैं। शुभ्रवर्ण वराह- मुक्ता जोमूत मुना कहलाती है। मेघसे मुक्ता उत्पन्न मुक्ता ब्राह्मण जातीय और रक्तवर्ण मुक्ता क्षत्रिय जातीय होती है इस विषयमें रत्नोंका मतभेद नहीं है। मेघमें होती है। यह बड़ी खुरखुरी होती है । धैश्य जातीय जैसे विजलो उत्पन्न होतो है वैसे हो मुक्ता भो जन्म लेती सुक्ता शुक्ल-पीतवर्णकी और येर-फूलको जैसी तथा शूद्र | है। विजली जिस प्रकार मेघसे गिरती है उसी प्रकार जातोय मुक्ता शुक्ल और कृष्णवर्णकी तथा फर्कश होती | सप्तम वायुस्कन्धले दामिनोको जैसी मुक्ता भी गिरती है। इसको घनापट घेर-फूलकी जैसी और रग शूकरके | है। किन्तु यह मुक्ता पृथिवी तक न पहुंचने पाती बीच ही नपे दांतके जैसा होता है। वराह-मुक्ता अत्यन्त दुर्लभ में देवता लोग हरण कर लेते हैं। इसको प्रभा . और अत्यन्त प्रशस्त होती है। विदुत्को जैसी होती है। जलबिन्दुओंके परिपाक वेणुज मुक्ता-यांसमें जो मुक्ता होती है उसे वेणुज विशेषसे भो मेघमें मुक्ता. उत्पन्न होती है। लेकिन मुक्ता कहते हैं। यांसमें जिस प्रकार वंशलोचन होता है। मनुष्य इसे पा नहीं सकते। यह मुक्ता मुर्गीके अण्डेके उसी प्रकार मुक्ता भी उत्पन्न होती है। धांसको मुक्ता समान गोल, तौलमें भारी और सूर्याकिरणकी जसो चन्द्रमा या कपूरके समान सफेद, गठनमें कंकोल फलको | दीप्तियुक्त होती है। मनुष्य इसका भोग नहीं कर सकते। जैसी और स्निग्ध होती है। अनेक जन्मों के पुण्यके मेघजात मुक्ता धरती पर नहीं गिरतो । देवता पिना यह मुका प्राप्त नहीं होती। पञ्चभूत गुणा- लोग इसे हरण कर लेते हैं। यह मुक्ता तेज और प्रभासे धिषयके अनुसार वांस पांच प्रकारका होता है अतएव | सभी दिशाभोंको प्रकाशित करती है तथा सूर्यके वांससे उत्पन्न मुक्तायें भी पांच तरहको होती हैं। समान यह दुर्निरिक्ष्य है। यह अग्नि, चन्द्रमा, नक्षत्र, प्रह पृथिवीकी प्रधानता हो, तो वेणुज मुक्ता वजनमें भारो, | और तारागणके भो तंजको मात फर देती है। यह रात अग्निकी प्रधानता हो, तो हलको, घायुको प्रधानतामें दिन एक समान प्रकाशित होती है। इसका मोल नहीं मृदु और बड़ी, माकाशकी प्रधानतामें कोमल और जल- हो सकता। की प्रधानतामें अत्यन्त उजली भोर स्निग्ध होती है । इन | ____ यदि जन्मजन्मान्तरोंके पुण्यवलसे किसीको यह मुक्ता सय मुक्काओको पहननेसे किसी तरहको भ्याधि नहीं | | 'मिल जाय तो वह शत्रु रहित हो कर सारो पृधियोका भोग करता है। यह मुक्ता केवल राजाओंके लिये __शखज मुक्ता-शंखसे इसको उत्पत्ति होती है, इसी- शुभ नहीं, वरन् जिस स्थानमें यह रहती है उसके चारों स इसका शखजमुक्ता कहत है। इस मुकाका रग शखका आर सी योजन स्थानका अशुभ दूर हो जाता हे। पेटके जैसा और परिमाणमें यह एक बड़े बेरके समान | मेघ जल, ज्योति और वायुसे उत्पन्न होता है। अत- होती है। पाञ्चजन्य शंखके वंशज शंखोंसे उत्पन्न मुक्ता | एव इससे उत्पन्न मुक्ता भी तीन प्रकारको होती है। उक घरापर और अलि या दामिनीकी तरह जलप्रधान मेघसे उत्पन्न मुक्ता अत्यन्त स्वच्छ, कोमल चमकीली होती है। 'और कान्तियुक्त होती है। ज्योतिःप्रधान मेघसे उत्पन्न अश्विनी आदि २७ नक्षत्रों में मुक्ता उत्पन्न करनेवाले मका सुगोल, सुकान्ति, सूर्यकिरणकी जैसी प्रकाशवाली शस्त्र जन्म लेते हैं। तदनुसार शंखज मुक्तायें भो २७ है। आंखें इसके प्रकाशको नहीं सह सकती। वायुका प्रकारको होती है। शुक्ल, अशुक्ल, पीत, रक्त, नील, भाग अधिक हो तो मेघजमुक्ता सुकान्ति, सुकोमल और लोहित, पिजर, कब्बुर और पाटल आदि वर्ण तथा सुंगाल होती है। लेकिन यह सबसे छोटो हुआ महत्; मध्य, लघु, आदि परिमाण द्वारा इसके २७ । करती है।' होती।