पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/८१५

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मुखरोग ७२७ , शतप्नी-जिस रोगमें लिदोपके विगढ़नेसे गलेमें कण्ठ-, और फालसेके फ़लके काढ़े को कुल्लो शरनेसे यहुत उप- '. को रोकनेवाला मांसांकुर निकल आता है तथा उसमें | कार होता है। कफज रोहिणी रोगर्भ गृहधूम, सोंड, ,कांटे और सूजन पड़ जाती है उसोको शतघ्नी कहते पीपल गौर मरिच च ण द्वारा प्रतिसारण करना कहते हैं। यह रोग जीवनाशक है। चाहिये। शिक्षाघ-जिस रोगमें दूपित कफ और रक्तसे गलेमें, सफेद अपराजिता, विडङ्ग दन्ती और सैन्धव द्वारा ..प्रावलेकी गुठलीकी तरह स्थिर और अल्प घेदनायुक्त तैल पाक करके नस्य लेने तथा कुली करनेसे कफ गांठ पड़ जाती है तथा खाया हुआ अनाज गलेमें अटका रोहिणीरोग आराम होता है । पित्तज रोहिणीरोगमें हुआ-सा मालूम होता है उसे शिलाघ कहते हैं। यह रोग पित्तरोगमें यतलाई गई चिकित्सा करनी चाहिये। कण्ठ- शस्त्र द्वारा शान्त होता है। शालूकरोगमें रत्त निकाल कर तुण्डिकेरी रोगको तरह . गतविद्रधि-जिस जिस रोगमें त्रिदोपके बिगडनेसे चिकित्सा करने तथा स्निग्ध ययान्न अल्प मात्रामें समूचा गला सूज जाता और दर्द करता है उसीको रोगीको खिलाने कहा है। अधिजिहा रागमें उा. गलविद्रधि कहते हैं। इस रोगमें वैदोपिक विधिके | जिहिक रोगकी तरह चिकित्सा करनी होती है। एक समी लक्षण दिखाई देते है। पृन्द रोगहें रक्तको निकाल कर विरेचनादि द्वारा काय- गलौघ--जिस रोगमें रक्तमिश्रित कफसे गलेमें कंठ । शोधन करना आवश्यक है। गृन्दरोगमें पकवृन्दरोग. को रोकनेवाला और श्वास-प्रश्वासको बाधा देनेवाला की तरह चिकित्सा करना होगी। शिलाघरोग शस्त्र- .:महाशाय उत्पन्न होता है तथा रोगीको अत्यन्त ज्वर क्रिया द्वारा आरोग्य होता है । गलविद्रधि रोगमे मम मा जाता है उसको गलौघ कहते हैं। स्थानके गत नहीं होने से उसे शस्त्र द्वारा काट सालना चाहिपे। खरत-जिस रागमें यायुके बिगड़नेसे रोगीको ___ कण्ठगतरोगमें रन निकाल कर कड़ी सुधनी लेना धुंधला दिखाई देता तथा ध्यासको गति तेज होती है, लाभदायक है। दशमहरिद्राको छाल, नीलकी छाल, गला सूखता है, स्वर भङ्ग होता है, खाया हुआ पदार्थ रसाञ्जन और इन्द्रयव इनके तथा हरीतकोफे कार्ड में मधु भीतर नहीं जाने पाता तथा वायुवहा नाड़ियां कफसे डाल कर पी जानेसे कण्ठरोग प्रशमित होता है। कटको, दूषित मालूम होती है उसको स्वरनरोग कहते हैं। अतीस, देवदार, अकयन, मोथा और इन्द्रजी, इनका गो. . मांसतान-जिस रोगमें त्रिदोपके बिगड़नेसे गलेमें मूत्रको साथ काढ़ा बना कर पीनेसे कण्ठरोग नए होता लम्या और अत्यन्त कष्टदायक शाथ उत्पन्न हो कर गले- को रोक देता है, उसको मांसतान कहते हैं। यह रोग है। दाख, फट्की, विकटु, दामहरिद्राका छिलका, सिफला, मोथा, अकयन, रसाअन, दूर भीर चय, इनफे समान जीवन-नाशक है। भाग चूर्णका मधुके साथ प्रयोग करनेसे बहुत लाम . विदारी-निस रोगमें पित्तके विगड़नेसे गले और । पहुंचता है। ये तीनों योग यथामम पात, पित्त और मुसमें ताम्नवर्ण तथा दाह और सूचियिद्धचत् घेदना. कफनाशक है। यवक्षार, चम्य, अकयन, रसाजन, दाय युक्त शोध उत्पन्न होता है तथा दुर्गन्धयुक्त सड़ा मांस हरिद्धा तथा पीपल इनके चूर्णको मधुके साथ मिला कर • गिरता रहता है उसे विदारी रोग कहते हैं। रोगो जिस | गोली बना कर मुहमें रयनेसे सय प्रकारका गलरोग करवटसे अधिक देर तक सोता है उसी करवटमें यह नष्ट होता है। रोग होता है। . समस्त मुखरोग-समस्त मुपगत रोग यावल, पित्तत इसकी चिकित्सा-साध्यरोहिणी रोगमें रक्तमोक्षण, . और कफजके मेदसे तीन प्रकारका है। इसे सर्पसर... यमन, धूमपान, गएड पधारण और नम्य लेना लाभदायक रोग कहते है। यातसे उत्पन्न सभी मुखरोग::मिन है। पातसे उत्पन्न रोहिणीरोग दूपित रक्तको निकाल । सातो मलों में जहरीले फोड़े निकल मान । कर प्रिय'गु-चूर्ण, चीनी और मधु घिसने तथा दाग चुभनेसी वेदना होती है।