पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/८१९

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मुखे ग्र-मुख्यमन्त्री ७३१ .. "एवमुक्त्वा ततः शीघ्र कृत्वा चैव प्रदक्षियम्। सबसे पहले करनेवाला, मंगुमा। २ यलमस प्रदायके ज्वलमानं तथा वहिं शिरः स्थाने प्रदापयेत् । मन्दिरोंका कर्मचारीविशेष। इसका प्रधान काम मूर्ति ... चातुर्वयोंधु संस्थानमेय भवति पुत्रिके ॥" (शुद्धितत्व ) पूजना और भोग लगाना है। ऐसा कर्मचारी प्रायः पाक- मुखान ( स० क्लो०) १ भोष्ठ, मोठ । २ किसी पदार्थका विद्या में भी निपुण हुमा करता है। अगला भाग । (नि०) ३ कण्ठस्थ, जो जवानी याद हो। मुखुली ( स० स्त्री०) बौद्ध देवताभेद, धौद्धोंको पक मुखातिव (अ० वि०) जिससे वातको जाय, जिससे कुछ देवीका नाम । कहा जाय । | मुग्वेभय (स० वि० ) मुखजात, जो मुहसे निकला हो। मुनानिल ( स० पु०) मुखस्य अनिलः । मुखमारत, मुख. मुखोत्कीर्ण (सपु०) काश्मीर-पति कुमारसेनका मन्त्री। वायु। (राजतरमियी ३१४) मुखापेक्षक ( स० त्रि०) अनुग्रहलामेच्छु, दूसरोंका मुह मुखोल्का (स० पु० ) मुखं उल्केव यस्याः। दायानल, ताकनेवाला। दावाग्नि । मुखापेक्षा ( स० लो०) दुसरोके आश्रित रहना, दूसरोंका | मुख्तलिफ (म० वि०) १ भिन्न, अलग । २ विविध प्रकार- मुंह ताकना। का, तरह तरहका। मुखापेक्षी (सपु० ) दुसरेकी रूपाटिके भरोसे रहने- मुख्तसर (अ० वि०) १ सक्षिप्त, जो थोड़े में हो । २ अला, पाला, वह जो दुसरोंका मुंह ताकता हो। थोड़ा । ३ शुद्र, छोटा। मुखामय ( स० पु०) मुखस्य आमयः ६ तत् । मुखरोग। मुप्तार (अ. पु० ) मुख्तार देखो। मुखामृत (स० क्लो०) मुखनिःस्तृत अमृत ना सौन्दर्य, मुख्य ( स० पु०) मुखामिय मुख्या विकार सत्यादिना मुखभी । २ यह लार जो छोटे छोटे योंके मुहसे , इवार्थे य । १ प्रथम कल्य, यशका पहला फल्प । बहती है। यागादिषु शास्त्रोक्तपथमः फल्पो मुख्यः स्यात् । 1. 'मषामोह (स० पु० स्त्री०) १ शल्लको पृक्ष, स लईका पेड़। (अमरटीका भरस २१३४०) २काण शिग्रु. काला सहिजन। . २ घेदका अध्ययन और अध्यापन। ३ अमाम्त - मुखाचिस (स' क्ली० ) मुखे दत्तं अञ्चिः । माखग्नि । | मास। (त्रि.) ४ श्रेठ, सबमें पड़ा। मुखार्जक (सपु०) अर्जक वृक्ष, यनतुलसीका पौधा ।। "प्रधानमुत्तर्ग रम्य ' मुख्यमगुत्तमम् । । मुखालिफ (१० यि०) १ विपरीत, जिलाफ। २ शत्र, वर गरेपयं प्रमुछा पराद प्रवरन्तथा ॥" दुश्मन । ३ प्रतिवन्धी। (पंचक रत्नमाला) मुखालिफत (अ०वि०) १ विरोध १२ शठता, दुश्मनो। मुम्पनान्द्र ( स० पु०) मुस्यश्चान्द्रः। चन्द्रसम्यन्धीय मुम्बाल (सपु०) स्वनामख्यात कन्दशाकविशेष, एक प्रधान मास, चान्द्रमासके दो विभागोंमेंसे एक चान्द्र. प्रकारका बड़ा मोठा कंद । इसे स्थूलकन्द, महाकन्द या मास दो प्रकारका है, मुरुपचान्द्र भीर गौणचान्द्र । दीर्घकन्द भी कहते है। यह मधुर, शीतल, रुचिकारी, मुख्यतस् ( सं० अध्य० ) मुख्य-तसिल । धेष्टरूपसे, धानबर्द्धक तथा पित्त, शोप, दाह और प्यासको दूर करने अच्छी तरह। याला माना गया है। मुख्यता (म खो०) मुरुष भाये सल् टाप् । प्रेता, मुखासर (सपु०)१ धूक । २ लार। . मुख्य होनेका भाय । मुवान (स० पु०) मुख अस्त्रमिय यस्य । फर्कट, केकड़ा गदास्पियुद्ध रावांपु च सापुमौ । मुनास्राव (-सपु०) महसे बहनेवाली लार या चक। अचिरान्मुख्यता प्राप्ती सर्व मोके धनुष्मता - मुखिक (सं० पु०) मुष्का श, मोखा नामक पेष्ठ। मुख्यनृप ( स० पु०) मुख्यः ष्ठ नृपः। मुखिया (हिं० पु०) १ नेता, प्रधान । २.किसी कामको मुण्यमन्त्री (स पु०) Trail