पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/८२६

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. इस तरहको दुर्गतिफे बाद तमुरचि घोड़े पर सवार ! आश्रय-दाताफे अनेक उपकार किये तथा उसकी तरफसे दो अपनी मांक पास पहुंचा। उसकी माता पीर स्त्रियों अनेक . युद्धोंमें जयलाभ कर उसकी राज्यसीमा (जो उसे मरा जान निश्चिन्त हो गई थी)-फे भानन्दको बढ़ाई। .. . सोमा न रही। उसका छोटा लड़का तुली भी पिताके आठ वर्ष इस प्रकार तमुरचिको सुनसे.दिन बिताते आने पर बानन्दफे मारे नाचने लगा था। इस मानन्द देख भावंग म्यांके , मन्त्री और पड़ोसी जलने लगे। के दिन तमुरवि काले घोड़े पर सवार था, इसीलिये विपक्षियों के पढ़यन्त्रस तमुरचि .घोड़ें ही दिनों में अब भो मुगल लोग इस तरहके घोडे का अधिक आदर आवंग खांके लड़के संगूनको कड़ी दृष्टि पर पड़ गया। लडफेकी चार यार उत्तेजनासे आवंग खां अपने आधित- तमुरवि अपने देशको लौट अपना राज्य बढ़ानेकी | के नाशमें सहमत हुआ। पड़यन्त्र चलने लगा और इच्छासे युद्ध में उठझा । इस समय उसने जाजराद, नैरुण, तमुरचि विपत्तिको पास आई जान फराचार जामुका, साजान ( जजान ) तान् जिउत्, कुडाराट, नु:यानके साथ भागनेको सलाह करने लगा। तदनुसार जलाइर, दूरमान, योधी, सूजो गौर पलीस नामक शत्रु उन्होंने अपने माने लड़के वालोंको फलाचीन पर्वतके पक्षीय मुगलों को अपने अधीन कर लिया। केवल वर्लस! पास पाल्जुना बुलाक नामफ. स्थानमें भेज दिया और वंशको अगुर करावार लोग पहले हीसे उसके साथ आप दोपहर रातको अपने अनुचरोंके साथ भाग सन्धि सूव बंधे थे । गये। आयंग खांकी. सेनाने उन लोगोंका पीछा किया विजित विपक्ष उसको समूल नाश करनेके लिये लेफिन युद्धमें हार खा कर उसकी सेनाको लौटना पड़ा। पड्यन्त्र रच १९९३ ई में एक स्थानमें इस हुए । तमु- इस युममें सगूनका मुद शत्रुके तौरसे विद्ध हो गया रुचि उन्हें संपामें अधिक तथा प्रबल देख रोकने के लिये और कितने रायत् सैनिकोंने प्राण त्याग किये। मागे न बढा, वरन् उसने अपने पिताके मिल आपंग खांके . तमुरचि अपने देशको लौटा। इस समय उसकी शरण लेने की इच्छासे उसके देशकी ओर चल पड़ा। अवस्था ४६ वर्षकी थी। उसके पुरे दिनों में जो सब फराचारका सरदार भी उसके साथ हो लिया।. नैरुण मुग़ल उसका साथ छोड़ इधर उधर भाग गये आवंग खो दुरल्गीन मुगलबंगकी करायत शाखा-!. थे, वे सभी धीरे धीरे उसके दल में मिल गये। इस का स्वामी था। फरायत् लोग संख्या अधिक तथा समय और फितनो ही मुग़ल शाग्याओंने उसको अधीनता तुर्क जातिमें सर्व प्रधान थे। सम्घान्त और ऐश्वर्यवान् । स्वीकार कर ली थी। . . . , . यादशाह गिता-ए-राज मालतान सांके साथ आवंग इस प्रकार एक बड़ी सेना खड़ी कर शक्तिशाली हो हांको मित्रता रहनेफे कारण दोनोंकी राजशक्ति सुदढ़ तमुरचिने वादशाह आयंग पिवद्ध युद्ध-घोषणा कर दी। हो गई थी। माघंग जां तुघल तुगीन् भी कहलाता था। युद्ध में पराजित हो आघंग ने. शवोंफे हाय रानी तमुरचि अपने अनुचरों के साथ करायतोंके राजा तथा लड़कियों को समर्पण कर आत्मरक्षा की। मायंगके पास पहुंचा। राजाने उसे बड़े भादरके साथ रखा। भाईने अपनी तीन लड़कियोंको तमुरचिके दाध सौंप यहां दिनों-दिन उसको अपस्था सुधरने लगो। मापंग छुटकारा पाया। भायंग यां जैसे प्रवाल पराक्रमी पाद पा प्रत्येक काममें उससे सलाद लिया करता था। शाहको हराने पर तमुरचिका यश चारों ओर फैल फार्मशः तमुरचि उसका ऐसा प्रीति-पाल हो गया कि गया। उसको शनिको देस और भी कितनी ही मुग़ल भायंग उसको स्नेहयश पुत्र कहा करती थी। उसने शास्त्राये' उसके अधीन होगा । इस समय तमुरचिने तमुधिको उच्च पद पर नियुक्त कर अपनी उदारता दिख! सामान्मोड़ा नामक स्थानमें सांकी उपाधि प्रहण को लाई थी। इस प्रकार प्रायः ८ वर्ष तक तमुरचिने सम्राटके (५६६ हिजरी) मधीन अपना समय बिताया। इसी बीचमें उसने अपने . . इसके बाद उसने भास-पासफे तुको, तातारी मौर .