पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/८३७

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मुगल ४७ परीक्षा कर रहा था। मराठा-सेनापति भाई साहबने , के साथ शासन विषयमें अंग्रेजोका विरोध हुआ। अली गीहरफे लड़के मिर्जा जघान भवत्को उसका । इस मौकेमें अगरेज लोग अंगालका मालिक बन प्रतिनिधि बनाया। धैठे। इधर जैसे मरठोंकी शक्ति बढ़ती जाती थी इस घटनाफे ठीक पहले बंगालमें सिराज उद्दौलाको , उधर धैसे दी अंग्रेजोंका भाग्य उगता जाता था। जिस हरा कर अगरेजी कम्पनी वहां मुगल-गनिको कमजोर समय मराठे और फरासीसी लोग मिल कर अगरेजोंके कर रही थी। इसी समय कम्पनीको चंगालकी दीवानी विरुद्ध उठ खड़े हुए उम समय मुगलशाही मानदानको मिली । इसको ले कर दिल्ली-सरकारके साथ अङ्गरेजो की हालत बुरी हो गई थी। लाई चेलेस्लीके शासनकालमें घनिष्ठता बढ़ गई। कोम्पनी देखो। अगरेज सेनापति लाई लेक यजीर सयादत अली पको - १०६०६०में पानीपतमें एक ओर हिन्दू सैन्यके 'हर हर महायतामें दिल्ली आया ( १८१२) । इसी समय महादेवकी जय' और दूसरी ओर पठानोंके 'अल्लाह | दिल्ली सरकार पर अगरेजों का प्रभाव जम गया । मलाइ, दिन, दिन' के निनादसे रणक्षेत्र और आकाश अगरेज रेसिडेन्टको प्रार्थना पर तथा सपारिषद गयर्नर गूंज उठा। पाठान लोगोंने रामलीलाके समय अचानक जेनरलके भावेदन पर कोर्ट भाप हिरेपटमने भारतके हिन्दुओं पर हमला किया। युद्धौ सयुक्त हिन्द और वादशाहकी वार्षिक वृत्ति निश्चित कर दी। इस गाये. मुगल हार गये। इधर अयोध्या मवाय यजोर सफा दनपत्र पर येलेसलो, जो एच० यालों और जो डोरके दरजंगके लड़के सुजा उद्दौलाको शकि ध्वंस हो गई। हस्ताक्षर थे। १७६४ ई० में घघसरके युद्ध मेजर मुनरोने सुजा उहोला बादशाह शाहमालमके मरने पर १८०६ ई०म ४८ वर्षको फो परास्त किया। उनमें २२ अफवरगाह दिल्ली के राजगद्दी पर बैठा । तय , १७६१ ई० में पानीपतके युद्ध के बाद, कावुलका शासक ' नक महरेज प्रतिनिधिने राजदरवारमें अपना प्रभुत्व फैला अवारली हिन्दुस्तानसे बहुमूल्य रत्न अपना देश ले गया। लिया था। लार्म बेलेमलोगे धादशाहको शक्ति न कर निर्वासित शाह आलमके लड़के जवान महलको शासन- . और दश हजार स०को यार्षिक वृत्ति निश्चित कर दो। भार मिला। प्रसिद्ध नाजिय उहीला (रोहिला ) उस ! अपयर एक अच्छा फयि था । कवितामें उसका 'सूया' का रक्षक नियुक्त छुटा। १७६४ ई०में यफमरमें सुजा नाम पाया जाता है । जिस समय रोमको राज्यपिजपिनी उद्दीलाको पराजयके याद, आलमने इष्ट इण्डिया कम्पनी शक्तिको अवनति हो गई थी उस समय रोमयासियोंन को धंगालकी दीवानीकी सनद दो । १७७८ ई०में अंग्रेजी तलवार छोड़ फलानोका आधय लिया था। नेपोलियन- कम्पनीको रक्षामे रहना .कष्टकर समझ, शाह आलम के अन्त होने पर झांसको शक्ति सिथिल पड़ गई थी दिल्ली चला गया। राजधानी आने पर रोहिला सरदार और वदोके रहनेवाले पिलासों में इव गये थे। इस कादिर खांने उसकी दोनों आखें निकाल ली। नाजिय प्रकार फ्रांसपाले राज शक्तिके कम दो आने पर विद्याफे 'उद्दीला लड़के नाजिय गांकी सम्पत्ति उसके चरित्र जोरसे अनेक वैज्ञानिक तत्वों का यायिष्कार कर सके दोपके कारण जल कर राजकोपमें ले ली गई । इस धे। लेकिन भारत के प्रतिहीन दिल्ली-सानायके - अत्याचारका बदला सधाने के लिये गुलाम कादिरने अयमान समयमें दो एक कविता-ग्रन्थको रचना छोट मादशाहक चंशधरको अंधा कर डाला | उसके बाद १८०६ मोर कोई विशेष उन्नति न हुई। बलदीन मुगल भोग- १० तक शाह भालम राज्य करके यहाँसे चल यसा! विलासमें पागल हो पाप-समुद्र में कूद पड़े थे। ये ' ' १७५७ ई०के पलाशी युद्धमे सिराज मारा गया। पापों का गाश्रय न छोद सके। इसीलिये अपने अधा पास्तयमें अंग्रेजी कम्पनी वगालका सूयेदार दुई और पतग याद मुगल लोग और किसी प्रकारको मानीय गधारका शानदान फेयल एक निर्दिष्ट मासिक पृत्ति उन्नति न कर मफे। 'ले कर सन्तुष्ट रहा। मोरजाफरफे दामाद गोरकासिम- १८३१ में भयुल राम उद्दीन मा.