पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/८४८

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७५८ जफ्फरजङ्ग-मुजफ्फरनगर ये ही चन्द शहर मंशहर हैं। इन सब शहरोमि म्युनिसि.। खां और दिलेर हिम्मत बाँफे नामसे भी परिचित थी। पलिटी अर्थात् स्थानीय स्वायत्तशासन है। सिंहासन पर बैठनेके समय बादशाह शाहआलमसे उसे अधियासियोंमें अधिकांश मुसलमान हैं। फिर । उक्त उपाधि मिली थी। १८०२ ई०में १ लाख ८ हजार हिन्दू, जैन, सिपल, किस्तान आदि और बलुची भी यहां : रु०को मासिक वृत्ति ले कर इसे अपना राज्य अंग्रेजों के हाथ छोड़ना पडा। इसके मरनेके याद इसका पोता ___ यहाँके शासनविभागमें एक डिपुटी कमिश्नर, एक तफजल हुसेन या मसनद पर बैठा।' : .... असिस्टेंट कमिश्नर और एक पंडिशनल असिस्टेन्ट । मुजफ्फरजङ्ग-हैदरावादके प्रसिद्ध सूधेदार निजामउलं. कमिशनर है। हरएक जिले में सब-जज और मुन्सिफ ; मुल्कका नातो। इसका वास्तविक नाम हिदायत् मुहीन हैं। प्रधानतः ८ सिविल जज तथा ११ मैजिष्ट्रेट न्याय: उहाँन था। निजाम उल मुलकको मृत्युके बाद उसने किया करते हैं। शिक्षामें यह स्थान विलकुल पिछड़ा । घोषणा कर दी कि मेरा नाना मरनेके समय एक दान हुआ है। इसमें सरकारी और गैरसरकारो कुछ स्कूल पत्र द्वारा मुझे ही अपने राज्यका उत्तराधिकारी वना हैं। सिविल हास्पिटलको छोड़ और भी ६ चिकित्सा- । गये हैं। इधर उसका मामा नासिरजंग अपनेको पितृ लय है। जलवायु यहाँका बड़ा स्वास्थ्यप्रद है। राज्यका एकमाल उत्तराधिकारी जान राज्यको दखल २ मुजफ्फरगढ़ जिलेको तहसील या एक सब- कर राजकाज चलाने लगा। पिताकी भतुल सम्पत्ति डिविजन ! यह शक्षा० २६ ५४ से ३० १५ पा र नासिरने अपनी सेनाका घेतन बुझा दिया उ० तथा देशा० ७०५१ से ७१ २१ पू०के मध्य अब- और इसी कारण सेनाने उसका साथ नहीं छोड़ा। स्थित है। यह चनाय और सिन्धु नदके वीच बसा हुआ मुजफ्फरजङ्ग अपनी सेनासे नासिरजङ्गको सेना बड़ी है। इसका रकवा ६१२ वर्ग मोल है। धान, जौ, गेहू, देख पहले तो निश्चेष्ट हो गया, पर पीछे वल सञ्चय कर बाजरा और इस्त्र आदि बहुतायतसे उपजती है । ६ दीवानी, फरासीसियोंकी सहायतासे १७४६ ई. आर्कटको लड़ाई. . और ५ फौजदारोअदालत हैं। । मे यहाँके नवाब अनवर उदोन खांको हराया और आप ३ उक्त निलेका प्रधान नगर। यह अक्षा० दाक्षिणात्यका सूवेदार बन बैठा। लेकिन यह राज्य. ३०.४ तथा देशा० ७१.१२ ०के मध्य अवस्थित है। सुख उसको बहुत दिन यदा न था। कुछ महोने के बाद ही सफो आवादी ४ हजारसे ऊपर है। १७६५ ई० मुज- उसे. नासिरजङ्गाके हाथ आत्मसमर्पण करना पड़ा। पफर खाने इसे सदर बनाया। तभोसे यह उसीके उस समयसे १७५० ई०के दिसम्बर में गुप्त शत्रुओंके द्वारा नामसे चला आ रहा है। मुजफ्फर खांने यहां नासिरजङ्गको मृत्यु- पर्यन्त उसे जेलमें रहना पड़ा। एक गढ़ बनवाया और शहरके चारों ओर दोवार पश्चात् यह फिरसे फरासीसियों को सहायता पा कर सूबे खड़ी कर दी थी। गढ़की दीवार प्राय: २० हाथ ऊची दारी मसनद पर बैठा । कुछ ही समयके बाद १७५१ १०के है। गढ़के चारों भोर १६ पुर्ज हैं जो ईटो यने हुए फरवरी में उसीफे एक नौकरने उसे मार डाला। उसकी है। इसके उत्तरांशमें राजकनेवारी लोग रहते हैं। मृत्यु के बाद वृद्ध निजामका तीसरा लड़का सलायत ___यहाँ विशेषकर कुपका जल हो पाने के काम आता जङ्ग मसनद पर बैठा । हुप्ले भौर हैदराबादं देखो। है। १८१८ में रणजिसिंहने उक्त गढ़ पर आम मुजफ्फरनगर-संयुक्त प्रदेशके मोरट डिविजनका एक मण किया था। शहरके अन्दर डाकपाला, डाकघर, जिला। यह अक्षा० २६१० से २६ ४५ ३० और गिर्जाघर और चिकित्सालय आदि हैं। ७७२ से ७८२ पू०के शेच फैला हुआ है। इसके मुजफ्फरजङ्ग-फर सावादका एक मुसलमान नवाद उत्तरमें सहारनपुर जिला और दक्षिणमें मोरट है। परवमें २७७१ ईमें यह अपने पिता अहमद सां बङ्गशके गंगा. इसको विजनौरसे और पश्चिममें यमुना मरनेके बाद सिंहासन पर बैठा। वह मुजफ्फर हुसेन फर्नालके पंजाव जिलेसे अलग करती है। इसमें १५