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पृष्ठ:हिन्दुस्थान के इतिहास की सरल कहानियां.pdf/१९७

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वह जानता था कि फरांल्सीसी अवसर पाते ही गिड़ पड़ेंगे। सिपाहियों का वेतन भी उस को वहीं न कहीं से देना पड़ता कयोकि ईस्ट इंडिया कम्पनी के व्यापार से जो लाभ होता था वह इतना न था कि अगंरेज सौदागरों में बाँटा भी जाय और सेना का वेतन भी दिया जाय। उस समय अङ्ग्रेजों की कोई जामीन्दारी नहीं थी, जिस से उन्हें कोई कर अथवा मालगुजारी मिलती। मद्रास का अगर और उस का कोट ही उन की कुल जायदाद थी। इस कारण गदननर को दही करना पड़ता जो दूपले ने किया था और उसने भी अपनी सेना को किराये पर देना स्वीकार किया। भने तुरन्त थोड़ी सी सेना महम्मद अली की सहायता को भेजी। इस सेवा का अफसर क्लाइव था। यह बहादुर लड़ता मित्ता विचनापल्ली के भीतर घुस गया और फिर बाहर निकल आया। इस बोरता के बदले में उस को कहानी का पद दिया गया। उस ने अङ्ग्रेज गवरनर त कहा "महम्मद अली दो चार दिन से अधिक अब नहीं ठहर सकता। और मेरी समझ में इस से बढ़ कर और कोई उपाय नहीं कि अरकाट जो चन्दा साहब का प्रधान नगर हैं छीन लिया जाय और वह अपने नगर के छिन जाने का समाचार सुन कर ज़कर त्रिचनापली का घेरा तोड़ देगा।"

५-अङ्गारेज गवरनर ने ऐसा ही किया। उस समय

वह केवल पांच सौ सिपाही दे सकता था, जिन में दो सौ