पृष्ठ:Aaj Bhi Khare Hain Talaab (Hindi).pdf/१०६

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गज़ल गवरी पुत्र है गणराज। समझों सदा पूरण काज।। आदू मरुस्थल है माड़। जैसलमेर गड़ रजवाड़।। पूरब दिशा गड़मल ताल। दोनों तरफ ऊंची पाल।। बंधीया घाट घाटी नाल। ऊपर महल मंदिर साल। भरीय नीर अमृत जान।। जिन पर शहर का मंडान।। दुनिया भरत आवत नीर। चोकी प्रथम ब्राजत पीर।। नाम जमालशा है जान।। मानें सकल मुसलमान।। फिर पठियाल जिनके पास। वहां सिध वसूते का वास।। परच्यो प्रगट पायो नाम। समझों सदा सिधी काम।। सांमी वासूवों की प्रोल। जातों वक्त डावे डोल।। छत्री साल मंदिर ठाट। बधीया सरोवर पर घाट।। देख्या बड़ा गज मंदर। शिव की मूर्ति अंदर।। होता गायत्री यगसाल। ब्रह्मण जीमता हदमाल।। कीतो युं अजीत ने काम। राख्यों बगेची को नामं।। मंदिर रच्यो गिरधारी के। नीचे सात बंध भारी के।। छत्री पास है मंदर। लोले बणायो पहोकर।। मोटो नीलकंठ महादेव। दुनिया सकल करती सेव।। आगे मंदिर पठसाला के। मालिक जबलपुर वाला के।। बाई सदांमा का महेल। दुनिया बैठ करती सहेल।। नीचे माई का ओटा के। लगता भंग का घोटा के।। बाहर बगेची घाली के। ब्रह्मण रहत सिरमाली के।। बिसां की बगेची त्यार। साला मंदिर महल अपार।। आदू गड़सीसर रावल। मंदिर बणायो सावल।। देवी मात है हिंगलाज। सेवा कीयों सरता काज।। भारी बुरज हे गड़ी के।। फोजों बीच में लड़ी के। इनके रहत जल चौफेर।। आगे लीया नेष्टा घेर। आया पराक्रमा दे ताल।। च्यारों तरफ हे पठसाल। सांमा बगेचा मंदर।। व्यासों तणा सांमीसर।। भीतर मोल हे निजदेख। व्यासों बणायो हद एक।। लिक्ष्मीनाथजी का बाग। मंदिर महल अच्छो लाग। आई बगेची जो आद। प्रोहितों बणाई रखयाद।। १०३ आज भी खरे हैं तालाब.