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आज भी खरे हैं तालाब
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सुख और दुख को तालाब से जोड़ने के प्रसंग हमें श्री भगवान दास माहेश्वरी, श्री राजेंद्र सिंह और श्री कलानंद मणि से मिले हैं।

बुंदेलखंड में गड़े हुए खजाने से तालाबों को बनाने का विवरण श्री योगेश्वर प्रसाद त्रिपाठी के संपादन में ब्रह्मानंद महाविद्यालय, राष्ठ, हमीरपुर, उत्तर प्रदेश से सन् १९७५ में प्रकाशित स्वामी ब्रह्मानंद अभिनंदन ग्रंथ से लिया गया है। पुस्तक में श्री बद्रीप्रसाद 'धवल' के लेख 'महोबा नगर का संक्षिप्त परिचय' में विक्रम संवत् २८६ से १२४० तक चंदेल वंश के राज का परिचय और उनकी बाईस पीढ़ियों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। इन बाईस राजाओं में से कुछ के नाम इस प्रकार हैं: चन्द्र ब्रह्म, बाल ब्रह्म, गज ब्रह्म, भक्ति ब्रह्म, जयशक्ति ब्रह्म "द्वितीय”, कील ब्रह्म, कल्याण ब्रह्म, सूर्य ब्रह्म, रूप विद्या ब्रह्म, राहिल ब्रह्म, मदन ब्रह्म, कीर्ति ब्रह्म तथा परिमाल ब्रह्म। यहां के बाईस बड़े तालाबों के नाम भी इन्हीं पर आधारित हैं। स्वामी ब्रह्मानंद अभिनंदन ग्रंथ हमें महोबा के श्री मनोज पटेरिया के सौजन्य से प्राप्त हुआ है।

आवाज लगाकर बिकने वाले इलाहाबादी अमरूद और नागपुरी संतरों को तो सब लोग जानते हैं। लेकिन बलदेवगढ़ की मछली? बंगाल में बलदेवगढ़ की मछली ले लो, जैसी आवाज भी सुनाई देती है। यह बलदेवगढ़ बंगाल में नहीं, बुदेलखंड में है और यहां के तालाबों की मछली विशेष स्वादिष्ट मानी जाती रही है।

छेर-छेरा त्यौहार और छत्तीसगढ़ से संबंधित अन्य सूचनाएं तालाबों के विवाह तथा बड़े गांवों की छे आगर छे कोरी वाली परिभाषा श्री राकेश दीवान की देन है।

सीता बावड़ी के गुदने से संबंधित जानकारी मध्य प्रदेश शासन से प्रकाशित चौमासा पत्रिका के विभिन्न अंकों से ली गई है। इसी प्रसंग में कुराऊ समाज की स्त्रियों के बीच गुदने की परंपरा पर दो पंक्तियां मद्रास डिस्ट्रिक्ट गजेटियर सीरीस' में श्री डब्ल्यू फ्रांसिस द्वारा तैयार किए गए सन् १९०६ के 'साउथ आरकाट जिला गजेटियर' से मिल पाई हैं।

बिंदुसागर का वर्णन कर्नल बी.एल. वर्मा से हुई मौखिक बातचीत पर आधारित है। उनका पता है: एम ४९, ग्रेटर कैलाश भाग २, नई दिल्ली-४८। इसी प्रसंग में बनारस के तालाबों के नाम भी दुहराए जा सकते हैं। इनका नामकरण इसी आधार पर किया गया था कि देश की सब नदियों का पवित्र जल यहां भी संग्रहित है। जेम्स प्रिंसेप नाम के एक अंग्रेज़ अधिकारी ने सन् १८२० के आसपास बनारस