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जो संकल्प लिया था, वह आज पूरा हुआ है। बस आगौर में स्तम्भ लगना और पाल पर घटोइया देवता की प्राण प्रतिष्ठा होना बाकी है। आगर के स्तम्भ पर गणेशजी बिराजे हैं और नीचे हैं सर्पराज। घटोइया बाबा घाट पर बैठ कर पूरे तालाब की रक्षा करेंगे।

आज सबका भोजन होगा। सुन्दर मज़बूत पाल से घिरा तालाब दूर से एक बड़ी थाली की तरह ही लग रहा है। जिन अनाम लोगों ने इसे बनाया है, आज वे प्रसाद बांट कर इसे एक सुन्दर-सा नाम भी देंगे। और यह नाम किसी कागज पर नहीं लोगों के मन पर लिखा जाएगा।

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चुनकरों के काम को पक्का करती गरट

लेकिन नाम के साथ काम खत्म नहीं हो जाता है। जैसे ही हथिया नक्षत्र उगेगा, पानी का पहला झला गिरेगा, सब लोग फिर तालाब पर जमा होंगे। अभ्यस्त आंखें आज ही तो कसौटी पर चढ़ेगी। लोग कुदाल, फावड़े, बांस और लाठी लेकर पाल पर घूम रहे हैं। खूब जुगत से एक-एक आसार उठी पाल भी पहले झले का पानी पिए बिना मज़बूत नहीं होगी। हर कहीं से पानी धंस सकता है। दरारें पड़ सकती हैं। चूहों के बिल बनने में भी कितनी देरी लगती है भला! पाल पर चलते हुए लोग बांसों से, लाठियों से इन छेदों को दबा-दबा कर भर रहे हैं।

कल जिस तरह पाल धीरे-धीरे उठ रही थी, आज उसी तरह आगर में पानी उठ रहा है। आज वह पूरे आगौर से सिमट-सिमट कर आ रहा है:

सिमट-सिमट जल भरहिं तलावा।
जिमी सदगुण सज्जन पहिं आवा॥

अनाम हाथों की मनुहार पानी ने स्वीकार कर ली है।

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१५ आज भी खरे हैं तालाब