पृष्ठ:Aaj Bhi Khare Hain Talaab (Hindi).pdf/२१

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१८ आज भी खरे हैं

है पर अभी कुछ ही पहले तक राजस्थान में गजधर को गृहस्थ की ओर से बड़े आदर के साथ सरोपा भेंट किया जाता रहा है। पगड़ी बांधने के अलावा चांदी और कभी-कभी सोने के बटन भी भेंट दिए जाते थे। ज़मीन भी उनके नाम की जाती थी। पगड़ी पहनाए जाने के बाद गजधर अपने साथ काम करने वाली टोली के कुछ और लोगों का नाम बताते थे, उन्हें भी पारिश्रमिक के अलावा यथाशक्ति कुछ न कुछ भेंट दी जाती थी। कृतज्ञता का यह भाव तालाब बनने के बाद होने वाले भोज में विशेष रूप से देखने में आता था।

गजधर हिन्दू थे और बाद में मुसलमान भी। सिलावट या सिलावटा नामक एक जाति वास्तुकला में बहुत निष्णात हुई है। सिलावटा शब्द शिला यानी पत्थर से बना है। सिलावटा भी गजधरों की तरह दोनों धर्मों में थे। आबादी के अनुपात में उनकी संख्या काफी थी। इनके अपने मोहल्ले थे। आज भी राजस्थान के पुराने शहरों में सिलावटपाड़ा मिल जाएंगे। सिंध क्षेत्र में, कराची में भी सिलावटों का भरा-पूरा मोहल्ला है। गजधर और सिलावटा - एक ही काम को करने वाले ये दो नाम कहीं-कहीं एक ही हो जाते थे। जैसलमेर और सिंध में सिलावटों के नायक ही गजधर कहलाते थे। कराची में भी इन्हें सम्मान से देखा जाता था। बंटवारे के बाद पाकिस्तान मंत्रिमंडल में भी एक सिलावट - हाकिम मोहम्मद गजधर की नियुक्ति हुई थी।

इनकी एक धारा तोमर वंश तक जाती थी और समाज के निर्माण के सबसे ऊंचे पद को भी छूती रही है। अनंगपाल तंवर ने भी कभी दिल्ली पर इांडा लहराया था। अभ्यस्त आंखों का सुंदर उदाहरण थे गजधर। गुरु-शिष्य परंपरा से काम सिखाया जाता था। नए हाथ को पुराना हाथ इतना सिखाता, इतना उठाता कि वह कुछ समय बाद 'जोड़िया' बन जाता। जोड़िया यानी गजधर का विश्वसनीय साथी। एक गजधर के साथ कई जोड़िया होते थे। कुछ अच्छे जोड़ियों वाले गजधर स्वयं इतने ऊपर उठ जाते थे कि बस फिर उनका नाम ही गजधर रह जाता, पर गज उनका छूट जाता। अच्छे गजधर की एक परिभाषा यही थी कि वे औजारों को हाथ नहीं लगाते। सिर्फ जगह देखकर निर्णय लेते कि कहां क्या करना है। वे एक जगह बैठ जाते और सारा काम उनके मौखिक निर्देश पर चलता रहता।

औज़ारों का उपयोग करते-करते इतना ऊपर उठना कि फिर उनकी ज़रूरत ही नहीं रहे- यह एक बात है। पर कभी औज़ारों को हाथ ही