पृष्ठ:Aaj Bhi Khare Hain Talaab (Hindi).pdf/२४

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कोरी या कोली जाति ने भी तालाबों का बड़ा काम किया था। सैंकड़ों तालाब बनाने वाले कोरियों के बारे में आज ठीक ढंग की जानकारी देने वाली एक पंक्ति भी नहीं मिल पाती। लेकिन एक समय था जब बहुत से क्षेत्र कोली जाति के सदस्यों को अपने यहां बसाने के लिए कई तरह की सुविधाएं जुटाते थे। महाराष्ट्र, गुजरात के अनेक गांवों में उन्हें जो ज़मीन दी जाती थी, उसका लगान माफ कर दिया जाता था। ऐसी ज़मीन बारा या वारो कहलाती थी। सचमुच लौह पुरुष थे अगरिया। यह जाति लोहे के काम के कारण जानी जाती थी। पर कहीं-कहीं अगरिया तालाब भी बनाते थे। तालाब खोदने, के औज़ार - गेंती, फावड़ा, बेल, मेटाक, तसले या तगाड़ी बनाने वाले लोग उन औज़ारों को चलाने में भी किसी से पीछे नहीं थे। बेल से ही बेलदार शब्द बना है। माली समाज और इस काम में लगी परिहार जाति का भी तालाब बनाने में, तालाब बनने पर उसमें कमल, कुमुदिनी लगाने में योगदान रहता था। कहीं-कहीं तालाब के किनारे की कुछ ज़मीन केवल माली परिवारों के लिए सुरक्षित रखी जाती थी। उनका जीवन तालाब से चलता था और जीवन-भर वे तालाब की रखवाली करते थे। भील, भिलाले, सहरिया, कोल आज अपना सब कुछ खोकर जनजाति की अनुसूचित सूची में शामिल कर दिए गए हैं पर एक समय में इनके छोटे-बड़े राज थे। इन राज्यों में ये पानी की, तालाबों की पूरी व्यवस्था खुद संभालते थे। बहती नदी का पानी कहां रोक कर कैसा बंधान बांधना है और फिर उस बंधान का पानी कितनी दूर तक सींचने ले जाना है यह कौशल भील तीर-धनुष की तरह अपने कंधे पर ही रखते थे। इस तरह बांधे गए बंधानों और तालाबों के पानी के दबाव की भी उन्हें खूब परख रहती। दबाव कितना है और कितनी दूरी के कुओं को वह हरा कर देगा, यह भेद वे अपने तीर से रेखा खींच कर बता सकते थे। राजस्थान में यह काम मीणा करते थे। अलवर ज़िले में एक छोटी-सी नई संस्था 'तरुण भारत संघ' ने पिछले २० वर्षों में ७५०० से अधिक तालाब बनाए हैं। उसे हर गांव में यही लगा कि पूरा गांव तालाब बनाना जानता है। कठिन से कठिन मामलों में संस्था को बाहर से कोई सलाह नहीं लेनी पड़ी क्योंकि भीतर तो मीणा थे जो पीढ़ियों से यहां तालाब बनाते रहे हैं। भीलों में कई भेद थे। नायक, नायका, चोलीवाला नायक, कापड़िया २१ आज भी खरे हैं तालाब