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आज भी खरे हैं तालाब


तो बुदेलखंड में बगरन यानी जहां से तालाब का अतिरिक्त पानी बगर जाए, निकल जाए।

नेष्टा को पहले वर्ष छोटा बनाते हैं। पाल से भी बहुत नीचा। नई पाल भी पानी पिएगी, कुछ धंसेगी, सो तालाब में पानी ज़्यादा रोकने का लालच नहीं करते। जब एक बरसात से मामला पक्का हो जाता है तो फिर अगले वर्ष नेष्टा थोड़ा और ऊपर उठाते हैं। तब तालाब ज़्यादा पानी रोक सकता है।

नेष्टा मिट्टी की कच्ची पाल का कम ऊंचा भाग है लेकिन पानी का मुख्य ज़ोर झेलता है इसलिए इसे पक्का यानी पत्थर चूने का बनाया जाता है। नेष्टा का अगल-बगल का भाग अर्धवृत की गोलाई लिए रहता है ताकि पानी का वेग उससे टकरा कर टूट सके। इस गोलाई वाले अंग का नाम है नाका। यदि यही अंग तालाब के बदले बंधान पर बने यानी किसी छोटी नदी-नाले के प्रवाह को रोकने के लिए बनाए गए छोटे बांध पर बने तो उसे ओड़ कहते हैं। पंखे के आकार के कारण कहीं इसे पंखा भी कहते हैं।

नेष्टा है तो शुद्ध तकनीकी अंग, लेकिन कहीं-कहीं ऐसा भी नेष्टा बनाया जाता था कि तकनीकी होते हुए भी वह कला-पक्ष को स्पर्श कर लेता था। जिन सिद्धहस्त गजधरों का पहले वर्णन किया गया है, उनके हाथों से ऐसे कलात्मक काम सहज ही हो जाते थे। राजस्थान के जोधपुर ज़िले में एक छोटा-सा शहर है फलौदी। वहां शिवसागर नामक एक तालाब है। इसका घाट लाल पत्थर से बनाया गया है। घाट एक सीधी रेखा में चलते-चलते फिर एकाएक सुंदर सर्पाकार रूप ले लेता है। यह अर्धवृत्ताकार गोलाई तालाब से बाहर निकलने वाले पानी का वेग काटती है। ज्यामिति का यह सुंदर खेल बिना किसी भोंडे तकनीकी बोझ के, सचमुच खेल–खेल में ही अतिरिक्त पानी को बाहर भेज कर शिवसागर की रखवाली बड़े कलात्मक ढंग से करता है।

वापस आगौर चलें। यहीं से पानी आता है आगर में। सिर्फ पानी लाना है और मिट्टी तथा रेत को रोकना है। इसके लिए आगौर में पानी की छोटी-छोटी धाराओं को यहां-वहां से मोड़ कर कुछ प्रमुख रास्तों से आगर की तरफ लाया जाता है और तालाब में पहुंचने से काफी पहले इन धाराओं पर खुर्रा लगाया जाता है। शायद यह शब्द पशु के खुर से बना है-इसका आकार खुर जैसा होता है। बड़े-बड़े पत्थर कुछ इस