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स्तर लगातार ऊंचा उठने लगे, तालाब पर खतरा मंडराने लगे तो घटोइया बाबा के चरणों तक पानी आने के बाद, अपरा चल निकलेगी और पानी का बढ़ना थम जाएगा। इस तरह घाट की, तालाब की रखवाली देवता और मनुष्य मिलकर करते रहे हैं।

तालाबों की तरह नदियों के घाटों पर भी घटोइया बाबा की स्थापना होती रही है। बाढ़ के दिनों में जो बड़े-बूढ़े, दादा-दादी घाट पर खुद नहीं जा पाते, वे वहां से वापस लौटने वाले अपने नाती-पोतों, बेटे-बेटियों से बहुत उत्सुकता के साथ प्राय: यही प्रशन पूछते हैं, "पानी कहां तक चढ़ा है? घटोइया बाबा के चरणों तक आ गया?" उनके पांव पानी पखार ले तो बस सब हो गया। इतना पानी आगर में हो जाए तो फिर काम चलेगा पूरे साल भर।

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जल राशि का मापदंड नागयाष्टि

पूरे साल भर आगर की जल राशि को, खज़ाने को आंकने-नापने का काम करते हैं उनमें अलग-अलग स्थानों पर लगने वाले स्तंभ। नागयष्टि बहुत पुराना शब्द है। यह नए खुदे तालाबों में जल स्तर नापने के काम आता था। इस पर अक्सर नाग आदि उत्कीर्ण किए जाते थे। जिन पर नाग का अलंकरण नहीं हुआ, वैसे स्तंभ केवल यष्टि भी कहलाते थे। धीरे-धीरे घिसते-घिसते यही शब्द 'लाठ' बना। यह स्तंभ भी कहलाता है और जलथंब या केवल थंभ भी कहीं इसे पनसाल या पौसरा भी कहा जाता है। ये स्तंभ अलग-अलग जगह लगते हैं, लगाने के अवसर भी अलग होते हैं और प्रयोजन भी कई तरह के।

स्तंभ तालाब के बीचों-बीच, अपरा पर, मोखी पर, यानी जहां से सिंचाई होती है वहां पर तथा आगौर में लगाए जाते हैं। इनमें फुट, गज आदि नीरस निशानों के बदले पह्म, शंख, नाग, चक्र जैसे चिह्न उत्किर्ण किए जाते हैं। अलग-अलग चिह्न पानी की एक निशिचत गहराई की सूचना देते हैं। सिंचाई के लिए बने तालाबों में स्तंभ के एक विशेष चिह्न तक जल-स्तर उतर आने के बाद पानी का उपयोग तुरंत रोक कर उसे फिर संकट के लिए सुरक्षित रखने का प्रबंध किया जाता रहा है। कहीं-कहीं पाल पर भी स्तंभ लगाए जाते हैं। पर पाल के स्तंभ के डूबने का अर्थ है 'पाले' यानी प्रलय होना।

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आज भी खरे हैं तालाब