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सागर, अरजर सागर में आज भी काम दे रही है। बरुआ सागर ओरछा के नरेश उदितसिंह ने और अरजर सुरजन सिंह ने क्रमशः सन् १७३७ तथा १६७१ में बनवाए थे। इनकी नहरें आज उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग की प्रतिष्ठा बढ़ा रही हैं।

पानी की तस्करी? सारा इंतज़ाम हो जाए पर यदि पानी की तस्करी न रोकी जाए तो अच्छा खासा तालाब देखते ही देखते सूख जाता है। वर्षा में लबालब भरा, शरद में साफ सुथरे नीले रंग में डूबा, शिशिर में शीतल हुआ, बसंत में झूमा और फिर ग्रीष्म में? तपता सूरज तालाब का सारा पानी खींच लेगा। शायद तालाब के प्रसंग में ही सूरज का एक विचित्र नाम 'अंबु तस्कर' रखा गया है। तस्कर हो सूरज जैसा और आगर यानी खज़ाना बिना पहरे के खुला पड़ा हो तो चोरी होने में क्या देरी?

इस चोरी को बचाने की परी कोशिश की जाती है, तालाब के आगर को ढालदार बना कर। जब पानी कम होने लगता है तो कम मात्रा का पानी ज़्यादा क्षेत्र में फैले रहने से रोका जाता है। आगर में ढाल होने से पानी कम हिस्से में अधिक मात्रा में बना रहता है और जल्दी वाष्प बन कर उड़ नहीं पाता। ढालदार सतह में प्रायः थोड़ी गहराई भी रखी जाती है। ऐसे गहरे गड्ढे को अखड़ा या पियाल कहते हैं। बुंदेलखंड के तालाबों में इसे भर कहते हैं। कहीं-कहीं इसे बंडारौ या गर्ल के नाम से भी जाना जाता है। इस अंग का स्थान मुख्य घाट की ओर रखा जाता है या तालाब के बीचों बीच। बीच में गहरा होने से गर्मी के दिनों में चारों ओर से तालाब सूखने लगता है। ऐसे में पानी घाट छोड़ देता है। यह अच्छा नहीं दिखता। इसलिए मुख्य घाट की तरफ पियाल रखने का चलन ज्यादा रहा है। तब तीन तरफ से पानी की थोड़ी-बहुत तस्करी होती रहती है, लेकिन चौथी मुख्य भुजा में पानी बराबर बना रहता है।

ग्रीष्म ऋतु बीती नहीं कि बादल फिर उमड़ने लगते हैं। आगौर से आगर भरता है और सागर फिर लहराने लगता है।

सूरज पानी चुराता है तो सूरज ही पानी देता है।

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४० आज भी खरे है तालाब