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आज भी खरे हैं तालाब

वापस हाती ताल लौटें। यह नाम संस्कृत से लंबी यात्रा कर थका दिखे तो सीधे बोली में से ताज़े नाम निकल आते थे। फूटा ताल, फुटेरा ताल भी यहां-वहां मिल जाएंगे।

जिस तालाब पर कभी जनवासा बन गया, गांव की दस-बारह बरातें ठहर गईं, उसका नाम बराती ताल पड़ जाता था। लेकिन मिथिला (बिहार) का दुलहा ताल एक विशेष ताल है। मिथिला सीताजी का मायका है। उनके स्वयंवर की स्मृति में यहां आज भी स्वयंवर होते हैं। अंतर इतना ही है कि अब वर का चयन कन्या नहीं करती, कन्यापक्ष करता है। दुल्हा ताल पर कुछ निश्चित तिथियों में कई लड़के वाले अपने लड़के लेकर जमा होते हैं। फिर कन्यापक्ष के लोग उनमें से अपनी कन्याओं के लिए योग्य वर चुन लेते हैं। छत्तीसगढ़ में भी ऐसे कुछ ताल हैं। वहां उनका नाम दुलहरा ताल है।

कई तालाबों के नाम लंबी कहानियों में से निकले हैं। लंबे समय तक इन तालाबों ने समाज की सेवा की है और लोगों ने लंबे समय तक इनकी लंबी कहानियों को ज्यों का त्यों याद रखा है।

रख-रखाव के अच्छे दौर में भी
कभी-कभी किसी खास कारण से
एकाधतालाब समाज के लिए
अनुपयोगी होजाता था।
ऐसे तालाब हाती ताल कहेजाते थे।
हाती शब्द संस्कृत के हत शब्द से बना है
और इसका अर्थ है नष्ट हो जाना।
'हत तेरेकी' जैसे चाल प्रयोग में भीयह शब्द
हततेरे भाग्यकी, यानी तेरा भाग्य नष्ट हो जाए
जैसे अर्थ में है।

ऐसे तालाबों में एक विचित्र नाम है 'हा हा पंचकुमारी ताल'। बिहार में मुंगेर के पास यह तालाब एक ऊंचे पहाड़ के नीचे बना है। कहानी में राजा है, उसकी पांच बेटियां हैं, जो किसी असंतोष के कारण ऊंचे पहाड़ से तालाब में डब कर अपने प्राण दे देती हैं। उन पांचों के शोक में तालाब का मूल नाम भी डूब गया और फिर लोगों ने उसे हा-हा पंचकुमारी के नाम से ही याद रखा है आज तक।

बिहार में ही लखीसराय क्षेत्र के आसपास कभी ३६५ ताल एक झटके में बने थे। कहानी बताती है कि कोई रानी थी जो हर दिन एक नए तालाब में स्नान करना चाहती थी। इस विचित्र आदत ने पूरे क्षेत्र को तालाबों से भर दिया। इस कहानी के कोई सौ तालाब आज भी यहां मिल जाएंगे आज भी खरे हैं और इनके कारण ही इस इलाके का जल-स्तर उम्दा बना हुआ है।