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आज भी खरे हैं तालाब
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इसी जयबाण ने दागा था गोलाताल

चली नहीं। परीक्षण के बाद ही शांति स्थापित हो गई। कहते हैं इसके बाद किसी ने उस तरफ हमला करने की हिम्मत नहीं की। गोला ताल आज भी भरा है और चाकसू कस्बे को पानी दे रहा है। अणुबम या कहें अणुशत्ति के शांतिमय उपयोग की बात बहुत हुई थी, हमारे यहां भी हुई। इसी राजस्थान में पोकरन में उसका विस्फोट हुआ पर कोई गोला तालाब नहीं बना। बनता तो विकिरण के कारण न बनने से भी ज़्यादा नुकसान पहुंचाता।

कभी-कभी किसी इलाके में कोई एक तालाब लोगों के मन में बाकी सबसे ज़्यादा छा जाता, तब उसका नाम झूमर ताल हो जाता। झूमर है सिर का आभूषण। झूमर ताल उस क्षेत्र का सिर ऊंचा कर देता। तब प्यार में जैसे बेटे को कभी-कभी बिटिया कहने लगते हैं, उसे झूमरी तलैया कहने लगते। बिलकुल भिन्न प्रसंग में एक झूमरी तलैया का नाम विविध भारती के कारण घर-घर पहुंच गया था।

भारती, भाषा की विविधता, ताल-तलैयों की यह विविधता समाज का माथा उचा करती थी।

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